मेरे महबूब का शौहर


जिंदगी का वो दौर था,
मैंने भी सीना तान दिया।
हारे हम कुछ इस कदर,
की दर्द आज तक नहीं मिटा।
फिर भी, सर झुक नहीं कभी,
किसी दुश्मन की दहलीज पर.
उनको बस इतनी ही ख़ुशी मिली,
की मेरे महबूब ने,
उनको अपना शौहर मान लिया।

 

परमीत सिंह धुरंधर

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