मेरे सैंयाँ,
मार के गुलेलिया,
हर सांझ रे.
फांस ले,
चिड़ियाँ हर रात में.
मेरे सैयां,
बड़े शैतान रे.
खेलें,
ऐसे – ऐसे दावँ रात में,
सुखल रहेला,
प्राण हर सांस में.
परमीत सिंह धुरंधर
मेरे सैंयाँ,
मार के गुलेलिया,
हर सांझ रे.
फांस ले,
चिड़ियाँ हर रात में.
मेरे सैयां,
बड़े शैतान रे.
खेलें,
ऐसे – ऐसे दावँ रात में,
सुखल रहेला,
प्राण हर सांस में.
परमीत सिंह धुरंधर