माँ, देखो कैसे,
अपनी बच्ची की जुल्फों में,
कंघी फेर रही है.
माँ, देखो कैसे,
अपनी बच्ची को सजा रही है.
माँ, भूल गयी है खाना,
माँ, भूल गयी है पीना।
जब से माँ के जीवन में,
एक बच्ची आयी है.
हाथों के जलने का,
अब पता नहीं चलता।
ना सांझ के ढलने पे,
किसी के आने का इंतज़ार ही रहता।
माँ, फिर से हो गयी है ,
गावँ की अल्हड एक छोरी।
जब से माँ के जीवन में,
ये नयी सहेली आयी है.
Based on true incident.
परमीत सिंह धुरंधर