संघर्ष ही मेरा उद्देश्य है


मुझे हार बर्दास्त नहीं,
और जीत की कोई चाह नहीं।
संघर्ष ही मेरा उद्देश्य है,
जब तक मंजिल,
आ जाती मेरे पास नहीं।
तारो-चाँद से, ये माना,
की किस्मत का है लेना – देना।
मगर मेरे हौसलों पे,
इनकी गति का कोई असर नहीं।
हर चट्टान मैं तोड़ दूंगा,
अगर वो मेरे राहों में आये.
उबड़-खाबड़ राहों के बिना,
मिलती धरा को कभी प्रवाह नहीं।
संघर्ष ही मेरा उद्देश्य है,
जब तक मंजिल,
आ जाती मेरे पास नहीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

कोई नहीं गणपति जैसा: सुन्दर और वयापमं.


कोई नहीं गणपति जैसा!
सुन्दर और वयापमं।
कोई नहीं गणपति जैसा!
सरल और सुगम।
हर्षित कर दें मन को,
और पुलकित हर उपवन।
कोई नहीं गणपति जैसा!
विघ्न – विध्वंशक।
कोई नहीं गणपति जैसा!
उत्तम -सर्वोत्तम।
विकट-विरल हो परिस्थिति,
या दुर्गम -दुर्लभ मार्ग हो.
कोई नहीं गणपति जैसा!
जो कर दे, हर मार्ग, निष्कंटक।
कोई नहीं गणपति जैसा!
जो देवों में प्रथम।
बस मोदक पे ही,
तुम्हे आशीष अपना दे दें.
बस दूर्वा पाकर तुमसे,
कर दे तुम्हारा भाग्योदम।
कोई नहीं गणपति जैसा!
मधुर- और – मोहक।

 

परमीत सिंह धुरंधर

गुनाहों की चादर


दुनिया की भीड़ में,
मैं खो गया.
ऐसा आप सोचते हो,
ये हकीकत नहीं हैं दोस्तों।
हकीकत तो ये है की,
गुनाहों की चादर,
इतनी लंबी है उनकी,
की मैं आसानी से छुप गया.

 

परमीत सिंह धुरंधर

जॉन – बिपाशा – करण: एक त्रिकोण


जैसे ही मैंने बिपाशा को अपनी बाहों में खींचा अपने ओठों के करीब, उसने मेरे कानो में धीरे से कहा, “तुम बाप बनने वाले हो.” बिजली के एक झटके से मैं उससे अलग होके, बिस्तर से कूद पड़ा.
मैं, ” ये क्या कह रही हो तुम? ये कैसे हो गया?”
बिपाशा सिर्फ मुस्करा रही थी जैसे मैंने कोई बेवकूफी कर दी हो. कुछ देर यूँ ही मुस्कराते और मुझे देखने के बाद उसने कहा, “तुमने ही तो किया है, इसमें इतना परेशान होने की जरुरत नहीं। मैं सब संभाल लुंगी, तुम्हे कुछ करने की जरुरत नहीं।”
मैं, “लेकिन बिपाशा, हम ने ये तय किया था न की अभी तीन – चार साल नहीं। चलो कल जाके गर्भपात करा लेंगे।”
बिपाशा, “देखो मुझे नहीं पता क्या तय हुआ था. मैं ऐसा कुछ नहीं करने वाली। ये मेरा सपना है. एक औरत मातृत्व के सुख के बिना अधूरी है. और, मैं ३५ की हूँ, चार साल मैं नहीं रुक सकती। मैं सिर्फ तुम्हे बता रही थी क्यों की अब पांचवा महीना है. मैं गर्भपात नहीं कर सकती।”
इतना सुनते ही मेरे पाँवों की जमीन खिसक गयी. मैंने कहा, “तुमने मुझे इतना बड़ा धोखा दिया। अगर तुम्हे मातृत्व का सुख ही चाहिए था तो जॉन के साथ ही ये सुख ले लेती।” इतना कह के मैं बाहर आ गया और सिगरेट सुलगा ली. वो अकेली कमरे में थी, मैंने उसकी दुखती नब्ज दबा दी थी.
कुछ देर बाद वो आयी और गले से लिपटते हुए बोली, “करण, तुम्हे पता है, जॉन ना तो शादी करना चाहता था ना ही वो बच्चा चाहता था. तुम अगर चाहते हो तो तलाक ले लेंगे, लेकिन मैं ये बच्चा चाहती हूँ.”
मैं, “बिपाशा, ये तो धोखा ही है न. तुम १० साल रही जॉन के साथ, लेकिन वो नहीं चाहता था, इसलिए तुमने अपने औरत बनने के सुख को ठुकराया। अब उस सुख के लिए तुमने मेरी आकांक्षाओं की परवाह नहीं की. इसका एक ही मतलब हैं की तुम्हे मुझसे प्रेम ही नहीं, तुमने सिर्फ बच्चे के लिए शादी की. अगर तुम्हे सिर्फ बच्चा ही चाहिए था तो तुम बिना जॉन को बताये भी तो कर सकती थी.”
बिपाशा, “तो क्या तुम दूध पीते एक बच्चे हो? तुम्हे नहीं पता था की शादी क्यों की जाती है? तुम सब मर्द एक से हो, तुम्हे सिर्फ जिस्म चाहिए। मैं उस समय तैयार नहीं नहीं माँ बनने के लिए. जब मेरा मन था तो जॉन शादी नहीं करना चाहता था. बिना शादी किये मैं माँ नहीं बन सकती थी
अगली सुबह, मैंने खुद को समझाया और बिपाशा के पास जाके माफ़ी मांगी और उसे डॉक्टर के पास जाने को बोला। उसने बताया, “मैं डॉक्टर से मिल आयी हूँ, मैं ठीक हूँ.” नौ महीने बाद मैं एक बच्चे का पिता और बिपाशा माँ बन चुकी थी. एक साल बाद जूनियर करण के जन्मदिन पे बिपाशा जिद पे अड़ गयी की जॉन को बुलाएँगे। मैं अचंभित था क्यों की उसी के चलते मैंने जॉन से बोलचाल बंद की, उसे शादी में नहीं बुलाया। बिपाशा, “जॉन मेरा एक अच्छा दोस्त हैं, उसने मुझे हर मोड़ पे सहयोग दिया है. मुझे नहीं समझ में आता, तुम्हे उससे क्या दिक्कत है.” अंत में मैं मान गया.
और आज तीन महीने बाद, हम दोनों का तलाक हो गया. बिपाशा फिर से जॉन के साथ रहने लगी हैं. मुझे कभी – कभी लगता है की उसने बस मुझसे बच्चे के लिए शादी की या जॉन को पाने के लिए. पत्रकारों को उसने तलाक के बाद कहा, ” मैं एक स्वभिमानी, स्वतंत्र, स्वयं पे निर्भर हूँ, मैं अपने बच्चे का लालन -पालन कर सकती हूँ. मैं आज की भारतीय नारी को एक संदेस देना चाहती हूँ की वो अपने बच्चे के लालन-पालन के लिए अपने पति पे निर्भर न रहें। मुझे ख़ुशी है की मेरा सच्चा दोस्त जॉन मेरे इस निर्णय के समय मेरे साथ है. और हाँ जॉन सिर्फ  मेरा दोस्त है, उसका अपना परिवार है, आप कृपया कुछ और न समझे।”

 

परमीत सिंह धुरंधर

चुनर सरक जाए


अंखिया -से – अंखिया ऐसे मिलाव गोरी,
ताहर चुनर सरक जाए, और उड़ जाए मेरी नींद गोरी।
देहिया – के – देहिया के पास, अतना लाव गोरी,
की ताहर कंगन खनक उठे, और हमार दिल गोरी।

 

परमीत सिंह धुरंधर

इश्क़


हमने इश्क़ किया जो,
तो समंदर भी रो पड़ा.
हालात ही कुछ ऐसे बन गए,
की तूफ़ान भी डर गया.
किश्ती हमारी,
गैरों की हो गयी,
मजधार में लहरों ने,
किनारा कर लिया।

 

परमीत सिंह धुरंधर

जिंदगी सबकी अधूरी ही है


समुन्द्र की लहरों,
पे बैठा हर इंसान,
बस किनारों को देखता है.
और किनारों पे बैठा इंसान,
लहरों को देखता है.
जिंदगी सबकी अधूरी ही है.
कोई अँधेरे में,
तन्हाई में रोता हैं,
तो कोई भीड़ में, महफ़िल में,
अंदर-ही-अंदर,
सुलगता है, सुबकता है.
जिंदगी सबकी अधूरी ही है.
कोई हुस्न की यादों में,
कोई हुस्न की बाहों में,
आकर, समाकर,
ओठों को चूमकर भी,
किसी – न – किसी प्यास में,
निरंतर, अविराम, ही जलता है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

हम तो उग्र्र हैं अपनी जवानी में


हम भी कम नहीं हैं उस्तादी में,
बस अंतर इतना है,
की वो मौन हो के खेलते हैं बाजियाँ,
और हम थोड़े वाचाल हैं अपनी जवानी में.
उनकी तमन्ना की रौंद दें हर किसी को,
और मैं तो रौंद ही देता हूँ,
जो टकराता हैं मुझसे मेरी राह में.
हम भी कम नहीं हैं छेड़खानी में,
बस अंतर इतना है,
की वो इंतज़ार में बैठे रहते हैं,
की कब एकांत हो.
और हम तो उग्र्र ही हैं अपनी जवानी में.

 

परमीत सिंह धुरंधर

इंसान बनने का मजा ही कुछ और है


शौक मुझे भी है की खुदा बनू,
मगर इंसान बनने का मजा ही कुछ और है.
ताकत के बल पे,
तो शैतान भी दुनिया को अपना बना ले.
मगर संघर्ष और बुलंद इरादों का नशा,
ही कुछ और है.
मैं मौन हूँ,
ये मेरी कमजोरी नहीं।
सपनों को सीने में दबाने का,
मजा ही कुछ और है.
ये निश्चित है की एक दिन,
तुम्हे कसूँगा अपनी इन बाहों में.
मगर जवानी में तनहा विरह की आग में,
जलने का नशा ही कुछ और है।

 

परमीत सिंह धुरंधर

हुस्न


टूट कर भी समंदर,
बिखरता नहीं।
ये दरिया है,
जिसकी किस्मत में ठहरना नहीं।
इश्क़ हमने भी किया है,
हुस्न के मिजाज में कहीं कोई वफ़ा नहीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर