रातों में नेहरू बनना चाहते हैं


ज़माने को गुनाह करने दो,
हम इश्क़ करेंगे।
वो शांत हैं, शातिर हैं,
बच के निकल लेंगे।
सिरफिरों में मेरा नाम
चलने दो।

भगत सिंह की इस धरती पर
सब लंबा जीना चाहते हैं।
रातों में नेहरू
और दिन में गाँधी
बनना चाहते हैं।
वो चालक हैं, चतुर हैं,
सत्ता हथिया लेंगे।

मुझे संघर्ष की राहों का
राम मनोहर लोहिया बनने दो।
भीड़ के इस अंधे मेले में
थोड़ा अलग तो मुझे रहने दो।
जो सच कहें,
उन्हें पागल ही रहने दो।

लड़कियों का क्या है?
वो इन्हीं से प्रेम करेंगी,
कुँवारी इन्हीं के बच्चों की माँ बनेंगी,
और फिर इन्हीं के आँगन में रोएँगी।
जो सच्चे होंगे,
वो ठुकरा दिए जाएँगे,
जो शातिर होंगे,
वो गले लगाए जाएँगे।

वो कमजोर नहीं, पारंगत हैं
इस शोषण के खेल में।
उन्हें ये खेल खेलने दो।
सत्ता के खिलाफ बिगुल
बजाने वालों में मेरा नाम रहने दो।

ज़माने को गुनाह करने दो,
हम इश्क़ करेंगे।
वो शांत हैं, शातिर हैं,
बच के निकल लेंगे।
सिरफिरों में मेरा नाम
चलने दो।

 

परमीत सिंह धुरंधर

 

यह कविता समाज की नैतिक विडंबनाओं, राजनीतिक पाखंड, प्रेम में छल, और सच्चाई के संघर्ष को व्यक्त करती है। कवि स्वयं को उस भीड़ से अलगमानता है जो सत्ता, स्वार्थ और दिखावे के पीछे भागती है।

कविता में Bhagat Singh, Jawaharlal Nehru, Mahatma Gandhi और Ram Manohar Lohia जैसे व्यक्तित्वों के माध्यम से आदर्शवादऔर अवसरवाद के बीच का विरोध दिखाया गया है। कवि उस व्यवस्था पर प्रश्न उठाता है जहाँ चालाक और शातिर लोग सफल हो जाते हैं, जबकि सच्चे और संवेदनशील लोग ठुकरा दिए जाते हैं।

“हम इश्क़ करेंगे” पंक्ति केवल प्रेम का प्रतीक नहीं, बल्कि विद्रोह, सत्य और मानवीय संवेदना को बचाए रखने का संकल्प है। पूरी कविता संघर्ष, अस्वीकार, और व्यवस्था-विरोधी चेतना का स्वर प्रस्तुत करती है।

This poem expresses rebellion against social hypocrisy, political opportunism, emotional manipulation, and the rejection of sincerity in modern society. The poet sees himself as different from the crowd that blindly chases power, image, and self-interest.

Through references to Bhagat Singh, Jawaharlal Nehru, Mahatma Gandhi, and Ram Manohar Lohia, the poem contrasts revolutionary ideals with the hypocrisy of contemporary society. It criticizes a world where cunning and manipulative people gain power and admiration, while honest and emotionally genuine individuals are ignored or rejected.

The recurring line, “We will continue to love,” is not merely about romance; it symbolizes resistance, humanity, and the refusal to surrender one’s truth despite corruption and betrayal. Overall, the poem represents a voice of struggle, alienation, and defiance against both social and political systems.

तनी कमर नपवा जा


तनी घूँघट में छुप के गोरी,
दालान में आजा.
भरल दुपहरिया में ठंडा,
दही-चूरा खिला जा.
अबकी के कटनी में,
नया कमरघानी बनवा देम.
तनी अंचरा गिरा के गोरी,
कमर नपवा जा.
छोड़ अ अब कहल,
बाबुल के प्रेम के कथा।
तनी फुरसत में,
तोता -मैना के किस्सा वाच जा.
अब की के दवनी में,
नायका लहंगा दिलवा देम.
तनी अंचरा गिरा के गोरी,
कमर नपवा जा.
कब तक माई-भाई के चिंता में,
जोबन के बांध बू.
कभी फुरसत में,
हमसे तेल लगवा जा.
अबकी के फगुवा में,
नायका चोली सिलवा देम.
तनी अंगिया हटा के,
जोबन नपवा जा.
तनी घूँघट में छुप के गोरी,
दालान में आजा.
भरल दुपहरिया में ठंडा,
दही-चूरा खिला जा.
अबकी के कटनी में,
नया कमरघानी बनवा देम.
तनी अंचरा गिरा के गोरी,
कमर नपवा जा.

 

परमीत सिंह धुरंधर

गोरी के जवनियाँ


पलकवाँ ना गिरे लोग के, देखी हलकवाँ सुखी जाला l
गोरी के जवनियाँ के, सारा जिला में बा हाला l
लगावेले कजरवाँ जब, दिन में रात होइ जाला l
चँदवो मलिन होके, घाटा में छिपी जाला l
केशिया बिखरावे जब, सावन के घटा छा जाला l
चूमेला गोरी के अचरियाँ के, धरती पे आकाश आई जाला l
पतली कमरिया से जब, जोबना के भार ना सहाला l
तब पनियाँ गगरियाँ के, देहिया में छलक छलक जाला l
सायवाँ उठवलस जब, हिलेला मलमलिया के नाला l
जवनका के का कहे के, बुढ़वों में जोश भर जाला l
सरवाँ घर घरे गगरी जब, नितंबवाँ वीणा के तम्बू बुझाला l
ऊपर से झुलावे चोटिया के, त वीणा में तार बन जाला l
मेनका के रूप पे जब, जैसे विश्वामित्र के तपस्या टूटी जाला l
वैसे दिल धुरंधर सिंह के, गोरी के चोली में फँस जाला l

These lines were written by my father Dhurandhar Singh.

आँखें तुम्हारी बड़ी बड़ी


आँखें तुम्हारी बड़ी बड़ी,
ये जुल्फे बिखरी सी l
क्या बात है हुस्न का तुम्हारे सनम,
हर दिल में तुम्ही उतरी सी l
है नशा जो तेरी आँखों में,
हम मयखाने में क्यों जाये l
है वफ़ा जो तेरी साँसों में,
हम पैमाना क्यों छलकाए l
तुमको पिलाना है पिला दो
मदहोश बनाना है बना दो l
तुम्हारे खूबसूरत जिस्म पे,
लहराता हुआ आँचल,
पागल करता है हमें,
तुम्हारी जुल्फों का बादल l
तुम्ही हो जब सावन की बदली,
हम कहीं और क्यों भींग जाए l
है वफ़ा जो तेरी साँसों में,
हम पैमाना क्यों छलकाए l
दिल में आग सी आप बसे हो,
कल नहीं आज नहीं बरसो से छुपे हो l
जब नाम आपका है गुनगुनाने को,
हम कोई और नगमा क्यों गाए l

 

परमीत सिंह धुरंधर

तुम जरा जो धीरे से चल दो


तुम जरा जो धीरे से चल दो,
मेरी सांसें मेरा साथ दे दे l
बस इतना कहना जो तुम मानो,
मेरे दिल में भी मौजे उमंग हो l
ना चाहत है मोहब्बत की तुमसे,
ना आरजू पास आने की l
मौत के दर पे खड़ा हूँ,
और क्या सजा है दिवाली की l
तुम जुल्फों का कफ़न जो पहना दो,
मेरी मौत भी दुल्हन बन सज संवर ले l
तुम जरा जो धीरे से चल दो,
मेरी सांसें मेरा साथ दे दे l
ये शर्मो हया ये कमसिन अदा,
तेरा हुस्न ऐ जालिम सारे जहाँ में है जुदा l
तुम जरा जो काजल लगा लो आँखों में,
मेरा दर्द भी कहीं छुप ले l
जाते जाते हमें इस जहाँ से
वो मंजर तो दिखला दो l
घुघंट उठ रहा हो तुम्हारा,
शर्म से पलके जड़ गई हो l
तुम जरा जो ऐसे संवार लो,
मेरी धड़कने भी मोहब्बत कर ले l
तुम जरा जो धीरे से चल दो,
मेरी सांसें मेरा साथ दे दे l
बुरा न मानो इस दिल का,
ये तो प्रेम का मारा हुआ है l
देख के हुस्न को तुम्हारे,
चित इसका भी बदला हुआ है l
तुम जरा मित्रता कर लो,
ये परमीत भी मनमीत बन ले l
तुम जरा जो धीरे से चल दो,
मेरी सांसें मेरा साथ दे दे l

These lines were written in 2004 during my interview for the post of Scientist C at BARC, Mumbai.

परमीत सिंह धुरंधर

हुस्न – इश्क़ का अंतर


ऐसे नहीं होता शिकार,
इश्क़ में, जिस्म का.
फिर अंतर ही क्या रह जाएगा?
हुस्न से, इश्क़ का.

 

परमीत सिंह धुरंधर

निरीह, सुसुप्त, वक्ष


मिल जाती है सबको ही सोहरत,
बाजार में.
ये सोहबत है, जो मिलती है,
बस पाठशालाओं और मयखानों की,
बंद दीवार में.
उनका आँचल है जो,
चुपके से सरक जाता है,
हर एक रात.
वक्षों को छोड़कर,
अकेला, निहत्था,
मझधार में.
ये तो सोहबत है, लबों की,
जो अपनी प्यास मिटाने को,
कर देता है आगे,
निरीह, सुसुप्त, वक्षों को,
भीषण संग्राम में.

 

परमीत सिंह धुरंधर

अर्जुन – पुत्र अभिमन्यु


यूँ ही धरा पे,
अब नहीं धीरज धरूँगा,
तुम कहोगे,
तो आज से ही युद्ध होगा।
साँसों के आखिरी क्षणों तक,
भीषण संग्राम होगा।
लाएंगे तुम्हारे स्वप्न, या फिर,
कुछ नया ही अंजाम होगा।
मुठ्ठी भर हैं, तो ये मत सोचो,
की मसल दिए जाएंगे।
आज ग्रहों-नक्षत्रों,
और स्वयं सूरज तक,
अर्जुन – पुत्र अभिमन्यु का,
तेज होगा।
भीषण – बाणों की बर्षा होगी,
चारों दिशाओं से.
जर्रे – जर्रे पे आज, सुभद्रा – पुत्र,
के रथ का निशान होगा.

 

परमीत सिंह धुरंधर

निकाह होने के बाद


मेरी मोहब्बत में,
उन्होंने एक खुसनुमा गुनाह,
कर दिया।
दिल मेरे नाम,
और जिस्म किसी और,
को कर दिया।
निकाह होने के बाद भी,
उनके नैनों के जाम मेरे हैं.
उन्होंने अपनी हया मेरे,
और बेहयाई किसी और के,
नाम कर दिया।
मत पूछ,
हुस्न से इस भेद का राज.
यही तो है, जिसने
जिस्म और दिल के आग,
को अलग – अलग कर दिया।
अब भी शिकायतें करते हो,
तुम हुस्न से.
अरे तुम्हारा पौरष क्या है?
इनके आगे.
इन्होंने अपने दो बाहों से ही,
कितनों के आँगन को,
गुलजार कर दिया।

 

परमीत सिंह धुरंधर

इश्क़


इश्क़ क्यों बदले?
अंदाजे-गुरुर को.
ये उनकी चोली नहीं,
जो फिसल जाती है,
हर रात को.
जिस्म को पा लेना ही,
बुलंदियों का नाम नहीं।
वार्ना युद्ध होते हरम में,
और सुरमा पैदा होते,
हर एक रात को.

 

परमीत सिंह धुरंधर