जिंदगी


कभी वक्त न रहा अपना
कभी वो न रहीं
ऐसे ही संभालता रहा जिंदगी।

कभी लगा भी नहीं की
यों फिसल जाएगा वक्त
और बिखर जायेगी जिंदगी।

अब अपने ही फैसले
अपने ही विरोध में खड़े हैं
क्या दोराहा, क्या चौराहा?
बस उलझ के रही गयी जिंदगी।

चढ़ी जब जवानी
तो नचा के रख दिया
जवानी ऐसे ढली
की बुढ़ापे का दर्द बन गयी जिंदगी।

 

परमीत सिंह धुरंधर

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