भीष्म सा तुमसे ठुकराई ना जाऊं


सोचती हूँ उम्र तुम्हारी बाहों में गुजार दूँ
पर डरती हूँ कहीं एक पत्थर ना बन जाऊं।
मैं भी देखती हूँ तुम्हे
तिरछी नज़रों से
पहचान लेती हूँ तुम्हे दूर से ही
तुम्हारे मुख, सीना, कन्धों
और टांगों की परछाई से
अच्छे लगते हैं तुम्हारे कहे
छेड़खानी के वो गंदे – शब्द
थक -हारकर सोचती हूँ
तुम्हारा घर बसा दूँ
पर डरती हूँ कही मैं ही अपने पंख न खो दूँ.
सीता जैसी सती से जब ली गई अग्नि-परीक्षा
द्रौपदी जैसी वधु को
जब समझा गया चौरस का एक पासा
सोचती हूँ इन सबसे गुजर जाऊं
तुम्हारे एक छुअन के लिए
पर डरती हूँ कहीं भीष्म सा तुमसे ठुकराई ना जाऊं।

परमीत सिंह धुरंधर

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