बिहार अपनी बूढी माई रे


हम ना हिन्दू, ना मुस्लिम
ना हम सिक्ख ना हम ईसाई रे.
हम हैं बिहारी रे बंधू
बिहार अपनी बूढी माई रे.
छपरा जिसका ह्रदय
जहाँ बहती है पुरवाई रे.
और गंगा जिस धरती पे
लेती है, बलखा – बलखा अंगराई रे.

हम जाए चाहे जहाँ
यादों में बस उसकी ही परछाई रे.
सारी दुनिया घूम ले हम चाहे
चाहे जितनी भी हो कमाई रे.
खाते हैं हम लिट्टी-चोखा
डाल के उसपे मलाई रे.
हम हैं बिहारी रे बंधू
बिहार अपनी बूढी माई रे.

परमीत सिंह धुरंधर 

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