हाँ, मैं ही बलात्कारी हूँ.


मैं पापी
मैं दुराचारी हूँ
हाँ, मैं ही बलात्कारी हूँ.
वो जो पैदल चल रहें हैं
धुप में, छावं की तलाश में
दिल्ली छोड़कर
पहुँचने को अपने गावं में
उनके ख़्वाबों को जलाकर
मिटाने वाला
मैं ही वो ब्रह्मपिचास, अत्याचारी हूँ.
हाँ, मैं ही वो बलात्कारी हूँ.

जिन्होंने सत्ता की कुर्सी पे
मुझे बैठाया
मेरे सपनो को मंजिल तक पहुँचाया
उनके मिटटी के घरोंदों को
उनके बच्चों के अरमानों को
रौंदने वाला, सितमगर, अनाचारी हूँ.
हाँ, मैं ही वो बलात्कारी हूँ.

परमीत सिंह धुरंधर 

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