नारी और श्री हरी


जब – जब नारी पात्र बनी है, हंसी, भोग, बिलास का
श्री हरी अवतरित हुए हैं लेकर नाम कृष्णा – राम का.

पूरी महाभारत रच दिया था, रखने को एक नारी की लाज
कैसे तुम नाम दोगे उसे नारी के अभिशाप का?

ज्ञान पे तुम्हारे लग रहा, अब अभिमान है छा रहा
वाणी ऐसी ही होती है, जिसके मन – मस्तक में हो पाप छिपा।

अभिमानी को कब हुआ है श्री हरी का आभास भी
ऐसे ही जन्म होते हैं कुल-काल-कोख पे दाग सा.

परमीत सिंह धुरंधर 

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