अतृप्त मन की पुकार


कब तक रचोगे प्रभु माया-मयी सृष्टि?
कभी तो गढ़ो प्रभु, मिले मन को तृप्ति।

क्षणभंगुर जग में भ्रमित-विस्मित हर दृष्टि,
सत्य ओझल हो रहा, बढ़ती जा रही आसक्ति।
भूख-प्यास के बीच अनवरत उठती लालसा,
बढ़ती जा रही है नित मानव-मन की इच्छा।
कब तक रखोगे प्रभु निर्मल को निर्धन?
कभी तो गढ़ो प्रभु, मिले निर्बल को तृप्ति।

नित नए स्वप्नों में उलझा यह जीवन,
पाकर भी सब कुछ रिक्त है मानव-मन।
धन, वैभव, यश सब माया की ही प्राप्ति,
फिर भी न मिटती अंतर्मन की अतृप्ति।
कब तक रखोगे प्रभु सरल पे ही विपत्ति?
कभी तो गढ़ो प्रभु, मिले सरल को तृप्ति।

न्याय की किरण कब ऊषा बनेगी?
कब संध्या पीड़ित की पीड़ा हरेगी?
हे करुनानिधान, हे नर में नारायण
कभी तो भक्तों की भी ले लो सुधि।
कभी तो गढ़ो अरुणोदय ऐसा, मिले सब को मुक्ति।

कब तक रचोगे प्रभु माया-मयी यह सृष्टि?
कभी तो गढ़ो प्रभु, मिले मन को तृप्ति।
लिख रहा भक्त है, प्रभु तुमको पत्री
कभी तो गढ़ो प्रभु, मिले मन को तृप्ति।
कब तक रचोगे प्रभु माया-मयी यह सृष्टि?
कभी तो गढ़ो प्रभु, मिले मन को तृप्ति।

RSD

भज गोविन्दम


भज गोविन्दम, भज गोविन्दम,
भज गोविन्दम रे.
मन की पीड़ा, तन का कष्ट
सब प्रभु हजार लेंगे।

भज गोविन्दम, भज गोविन्दम,
भज गोविन्दम रे.
ना कोई माया है, ना कोई है छल
निमल मन से पुकार लो
प्रभु दौड़े आएंगे।
भज गोविन्दम, भज गोविन्दम,
भज गोविन्दम रे.

चार पहर के मल्ल युद्ध में
जब ग्राह ने छल किया।
भक्त की पीड़ा पे श्रीहरि दौड़े
ना क्षण भर का विश्राम किया।
बस नयनों में नीर को भर लो
प्रभु दौड़े आएंगे।
भज गोविन्दम, भज गोविन्दम,
भज गोविन्दम रे.

नारी और श्री हरी


जब – जब नारी पात्र बनी है, हंसी, भोग, बिलास का
श्री हरी अवतरित हुए हैं लेकर नाम कृष्णा – राम का.

पूरी महाभारत रच दिया था, रखने को एक नारी की लाज
कैसे तुम नाम दोगे उसे नारी के अभिशाप का?

ज्ञान पे तुम्हारे लग रहा, अब अभिमान है छा रहा
वाणी ऐसी ही होती है, जिसके मन – मस्तक में हो पाप छिपा।

अभिमानी को कब हुआ है श्री हरी का आभास भी
ऐसे ही जन्म होते हैं कुल-काल-कोख पे दाग सा.

परमीत सिंह धुरंधर