कच्ची है प्रेम की डोर


मदिरा मेरे कंठ से उतर कर कर गयी दिल पे जोर
छोटी सी इस जिंदगी में कितनी कच्ची है प्रेम की डोर?

शाम को जो पुलकित-पुष्प थी, काँटे हो गयी होते भोर
छोटी सी इस जिंदगी में कितनी कच्ची है प्रेम की डोर?

Rifle Singh Dhurandhar

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