हे गोरी तेरी पतली कमर पे अब भी
रखता हूँ निशाना दिल का.
मैं टूटा हूँ फिर भी
ख्वाब टूटा नहीं है दिल का.
Rifle Singh Dhurandhar
हे गोरी तेरी पतली कमर पे अब भी
रखता हूँ निशाना दिल का.
मैं टूटा हूँ फिर भी
ख्वाब टूटा नहीं है दिल का.
Rifle Singh Dhurandhar
टूटती हैं चूड़ियाँ मोहब्बत में
तकरार में, प्रहार ना कीजिये।
Rifle Singh Dhurandhar
ना शहर मेरा, ना राहें मेरी
ए जिंदगी, कैसे सम्भालूं तुझे?
ना चाँद मेरा, ना तारें मेरे
ए जिंदगी, कैसे सजाऊँ तुझे?
पुकारूँ किसे, बताऊं किसे?
जो दर्द हैं दिल में मेरे।
ना बाग़ मेरा, ना बहारें मेरी
ए जिंदगी, कैसे बहलाऊँ तुझे।
भटकना ही है किस्मत मेरी
भटकना ही है मंजिल मेरी।
ना सुबहा मेरी, ना रातें मेरी
ए जिंदगी, कैसे ठहराऊँ तुझे।
सावन में हूँ एक पतझड़ सा मैं
राहों में हूँ सबके एक कंकर सा मैं.
ना साथी कोई, ना साथ कोई,
ए जिंदगी, किसे सुनाऊँ तुझे?
Rifle Singh Dhurandhar
जिंदगी जहाँ पे दर्द बन जाए
वहीँ से शिव का नाम लीजिये।
अगर कोई न हो संग, राह में तुम्हारे
तो कण-कण से फिर प्यार कीजिये।
राम को मिला था बनवास यहीं पे
तो आप भी कंदराओं में निवास कीजिये।
माना की अँधेरा छाया हुआ हैं
तो दीप से द्वार का श्रृंगार कीजिये।
जिंदगी नहीं है अधूरी कभी भी
तो ना अपहरण, ना बलात्कार कीजिये।
माना की किस्मत में अमृत-तारा नहीं
तो फिर शिव सा ही विषपान कीजिये।
Rifle Singh Dhurandhar
अँखियाँ लड़ाके पीया से सखी
निंदिया आवे रोजे भोर में.
सास दे तारी रोजे गारी
पर मीठा लागे उनकर बोल रे.
Rifle Singh Dhurandhar
वो भी क्या दिन थे?
पिता के साथ में
हम थे हाँ लाडले
आँखों के ख्वाब थे.
जो भी माँग लिया
वो ही था मिल जाता
वो थे आसमान
और हम चाँद थे.
भाग्या प्रबल था
और हम भी प्रबल थे
वो कृष्णा थे हमारे
हम प्रखर थे उनके छाँव में.
Rifle Singh Dhurandhar
हर – हर, हर -हर, शिवशंकर
महादेव, बम – बम.
कैलास से उतरो, की अनाथ से हैं हम.
भटक रहें हैं दर -दर
आ गए प्राणों पे भी लाले
तुम्ही बताओ पिता, अब किसको पुकारे हम?
भागीरथ को भय नहीं
हाँ, अपनी हार का
पर कब तक उठाएंगे हम माथे पे ये कलंक?
पीड़ा मेरी अब तो
पहाड़ सी हो गयी
अब तो खोल दो प्रभु अपने ये नयन.
Rifle Singh Dhurandhar
कटती नहीं हैं रातें पिया परदेश में आके
एक रात तो बिता लो संग खाट लगाके।
किससे करूँ मन की बातें, किसके संग मनुहार?
कोई दर्द फिर जगा दो, सीने से हमको लगाके।
Rifle Singh Dhurandhar
देहिया गुलाबी करके
नयना शराबी करके
बालाम परदेशी हो गए.
मनवा के गाँठ खोल के
चिठ्ठी – आ – पाती पढ़ के
बालाम परदेशी हो गए.
अंग – अंग पे निशानी दे के
चूल्हा-चुहानी दे के
बालाम परदेशी हो गए.
मुझको बेशर्म करके
लाली और मेहँदी हर के
बालाम परदेशी हो गए.
मुझसे छुड़ा के मायका
मुझको दिला के चूड़ियाँ
बालाम परदेशी हो गए.
करवट मैं फेरूं रात भर
सुनकर देवरानी की चुहल
बालाम परदेशी हो गए.
Rifle Singh Dhurandhar
ए मेरे दिलवर
मुझे प्यार करके तू
बदनाम कर दे आज-२.
फिर पाने को तुझे
ढूंढती रहूं
बेशर्म होके मैं
हर सुबहों -शाम.
मेरा रूप-रंग, यौवन,
ये साजों-श्रृंगार
छू कर इन्हें
पावन कर दे आज.
तू बरसे मुझपे
बादल बनके
मैं भींगती रहूं
सारी-सारी रात.
लूट जाने दे मुझे
खलिहान में अपने
इससे मीठी ना होगी
किसी आँगन की खाट.
Rifle Singh Dhurnahdar