जिंदगी


जिंदगी को मेरे जब भी तौला जाएगा
ए जमाना, असफल इसे लिखा जाएगा.
मगर चुनौतियों का जब तकाजा होगा
इतिहास में मुझ सा न कोई दूजा होगा।

Whenever my life will be analysed
It will be considered unsuccessfull.
But when the challenges of life also become paet of the ablysis.
There will be noone like me in history.

परमीत सिंह धुरंधर 


इश्क़ में लड़कियाँ नहीं रोती
जो गुजर गयी जिंदगी, वो लौट के नहीं आती.

Girls don’t cry in love
The life that has passed does not come back.

परमीत सिंह धुरंधर 

लहरें


समंदर नहीं संभाल सका, वो लहरें तुम्हारी क्या होंगी?
तुम्हे छू कर, तोड़ कर, वो मुड़ जाएंगी।

The sea could not handle even if they originated from the sea. How can you expect anything then?
These waves will return after finishing their jobs or after breaking you.

परमीत सिंह धुरंधर 


वो बदल लेती हैं काजल, हर रात अपनी आँखों का
नए सफर की शुरुआत, पुरानी यादों से नहीं होती।

She changes collyrium of her eyes every night
A new journey does not begin with old memories.

परमीत सिंह धुरंधर 

पहाड़


ए पहाड़
तुझे कोई मिटाना चाहता है
की तू ब्रह्मिणवाद की पहचान है.
तुझे कोई अपना कहता है
तुझे बचाना चाहता है
की तू उनके अपने जंगल का है.
फिर कौन है तू?

वो बाते करते हैं तेरी
पर तेरे अस्तित्व की नहीं।
जो तुझे जंगल का कहते हैं
उन्हें ना जंगल की चिंता है, ना तेरी
उनको डर हैं अपने पहचान की
अपने पिछड़ जाने की इस दौड़ में।
जो तुझे ब्राह्मणों का कहते हैं
उन्हें तुझसे तो कोई भय नहीं
तू जड़ है, स्थिर है, मूक है, अहिंषक है
फिर ये तेरा ऐसा, भीषण विरोध कैसा?

परमीत सिंह धुरंधर 

कौन कहता है?


कौन कहता है की इश्क़ में मजा नहीं?
हँस रहा हूँ या रो रहा हूँ, खुद को ही पता नहीं।

कौन कहता है की हुस्न वफादार नहीं होता?
थोड़ा उछालो, खनकावो या बिछा दो,
सिक्के सोने के, चांदी के, फिर देखो
वैसी कोई रात कभी आती नहीं।

समंदर आज भी शिकारी है
ये तो लोग हैं जो किनारों पे घर बनाने लगे हैं.

परमीत सिंह धुरंधर 

विडम्बना


जंगल को जो अपना कहते हैं
ये कैसी विडम्बना है?
वो राष्ट्र को नहीं मानते।

पत्थर -पहाड़, पेड़
नदियाँ, सूर्य को अपना कह
पूजते हैं
पर ये कैसी बिडम्बना है?
राष्ट्र को बस भूगोल
भूगोलिक – सरंचना
और कुछ नहीं मानते।

परमीत सिंह धुरंधर 

शिव


हे शिव
आप पिता हो मेरे
इतना ही काफी है
आपकी पूजा के लिए.

आप योगी, निश्चल-निश्छल
चराचर में सम्माहित
महाकाल हो
इतना ही काफी है
आपकी बन्दना के लिए.

परमीत सिंह धुरंधर 

धुप में


इन आँखों का असर देख साकी
पी मैं रहा हूँ, झूम तू रही है.

अंग ये पुष्प से, खिल उठे हैं धुप में
ऐसी क्या बात है गोरी, तू छुप रही है शर्म से.
तू कहे तो रंग दूँ, आज तुझे अपने रंग में
फिर नहीं आएगा ये मौसम किसी सर्द में.

विचारधारा अलग-अलग है
पर हम एक हैं, हिन्दोस्तान हमारा है.

परमीत सिंह धुरंधर 

जोगीरा सारा रारा, जोगीरा सारा रारा।


इ रहली छपरा के, उ रहली सिवान के
दुनो के रंगनी बीच महराजगंज – बाजार में.
जोगीरा सारा रारा, जोगीरा सारा रारा।

इ के बाप थानेदार, उ के बाबू जी तहसीलदार
दुनो के मिलल बा बकलोल भतार।
जोगीरा सारा रारा, जोगीरा सारा रारा।

इ मिले गाछी में, उ मिले बथानी
इ कहे हमके राजा, उ कहे स्वामी।
जोगीरा सारा रारा, जोगीरा सारा रारा।

इ कहस माई – माई, उ कहस ताई – ताई
जब डालनी रंग पकड़ के कलाई।
जोगीरा सारा रारा, जोगीरा सारा रारा।

इ कहस छोड़ दे, उ कहस अब रहे दे
हम कहनी तानी अउरी लहे दे.
जोगीरा सारा रारा, जोगीरा सारा रारा।

इ लगली गलियाये, उ लगली छटपटाये
जब चोली दुनो के लगनी भिंगाये।
जोगीरा सारा रारा, जोगीरा सारा रारा।

इ चाटे चटनी, उ चखे चोखा
देख के पाकल कटहल, खाये लागली कोवा।
जोगीरा सारा रारा, जोगीरा सारा रारा।

परमीत सिंह धुरंधर