नयना जब तुमसे मिले
तो एक सिहरन सी उठी अंग-अंग में मेरे
और मैं संवर गयी.
सखियाँ मेरी जो ना समझी
मेरे ह्रदय को
देख के दर्पण
मैं स्वयं वो सब समझ गयी.
परमीत सिंह धुरंधर
नयना जब तुमसे मिले
तो एक सिहरन सी उठी अंग-अंग में मेरे
और मैं संवर गयी.
सखियाँ मेरी जो ना समझी
मेरे ह्रदय को
देख के दर्पण
मैं स्वयं वो सब समझ गयी.
परमीत सिंह धुरंधर
कौन कहता है की मुझे तुमसे मोहब्बत नहीं?
जरा पूछ इन खगचरों से
जिनके साथ मैं तुझे पाने को उड़ा
की आसमा में कहीं भी सुराख नहीं है.
परमीत सिंह धुरंधर
दिल से लीजिये
दिल नहीं है तो
दिमाग से लीजिये
मगर फैसला तो लेना ही होगा।
यह कुरुक्षेत्र है दोस्तों
हौसला नहीं भी हो तो लड़ना ही होगा।
पलट तो सकते नहीं
मुख को मोड़ सकते नहीं
सोचने – समझने का अब कुछ नहीं
हाथ में अपने कुछ नहीं
कर्म का अब वक्त नहीं
सब निश्चित और सुनिश्चित है
उसको बदल पाना अब मुमकिन नहीं।
हसरतें, चाहतें सब छोड़कर
इरादों को बुलंद करना ही होगा।
यह कुरुक्षेत्र है दोस्तों
हौसला नहीं भी हो तो लड़ना ही होगा।
जो सम्मुख हैं
वो विमुख हैं
जो संग हैं खड़े
वो तो अप्रत्यक्ष हैं
अपने लक्ष्य के भेदन के लिए
अपने गांडीव पे तीरों का अव्वाहन करना ही होगा.
यह कुरुक्षेत्र है दोस्तों
हौसला नहीं भी हो तो लड़ना ही होगा।
परमीत सिंह धुरंधर
सोचती हूँ उम्र तुम्हारी बाहों में गुजार दूँ
पर डरती हूँ कहीं एक पत्थर ना बन जाऊं।
मैं भी देखती हूँ तुम्हे
तिरछी नज़रों से
पहचान लेती हूँ तुम्हे दूर से ही
तुम्हारे मुख, सीना, कन्धों
और टांगों की परछाई से
अच्छे लगते हैं तुम्हारे कहे
छेड़खानी के वो गंदे – शब्द
थक -हारकर सोचती हूँ
तुम्हारा घर बसा दूँ
पर डरती हूँ कही मैं ही अपने पंख न खो दूँ.
सीता जैसी सती से जब ली गई अग्नि-परीक्षा
द्रौपदी जैसी वधु को
जब समझा गया चौरस का एक पासा
सोचती हूँ इन सबसे गुजर जाऊं
तुम्हारे एक छुअन के लिए
पर डरती हूँ कहीं भीष्म सा तुमसे ठुकराई ना जाऊं।
परमीत सिंह धुरंधर
पतली कमर और डगर पतली
कैसे संभालोगी अपनी गगरी?
रखवार मेरा है छपरा का धुरन्धर
तुझ जैसे बिलाड़ लगाएंगे बस टकटकी।
परमीत सिंह धुरंधर
तू काली – काली सी
पर लगती है कोई हीर.
कभी अकेले में मुझसे मिल
संग लगाएंगे कचहरी।
जितना तुझे देखता हूँ
उतनी तू भा रही.
ये नशा है मेरा
या तेरी जादूगरी।
परमीत सिंह धुरंधर
ना दौड़ा करों यूँ उछल – उछल के
की वक्षों पे सागर लहरा गया.
मन तो मेरा फ़कीर है पर
देख के तुमको ठहर गया.
अभी -अभी तो चढ़ी जवानी
अभी से मौसम बदल गया.
मन तो मेरा फ़कीर है पर
देख के तुमको ठहर गया.
परमीत सिंह धुरंधर
तू न मिली इस जीवन में, अगले जीवन का क्या पता?
दर्द बहुत है, पर प्रिये तुझे पाने के लिए, मैं लौटूँगा।
परमीत सिंह धुरंधर
कब तक बहलाओगी किताबों से खुद को?
वो बचपन का दौर था, ये जवानी का दौर है.
आँखों के शर्म को पलकों पे रहने दो
वो घूँघट का दौर था, ये निगाहों का दौर है.
परमीत सिंह धुरंधर
जो तन्हा है
वो Crassa तो नहीं है.
जिसे प्यार मिल गया
उसे वक्त ने तरासा तो नहीं है.
दो-बूंदों में लहलहा जाए जो फसल
उसमे किसान का पसीना तो नहीं है.
जिन्हे अपने इतिहास का ज्ञान नहीं
उन राजपूतों की कोई गाथा तो नहीं है.
हर शहर की किस्मत में मेरा साथ नहीं
ऐसा शहर भी नहीं, जहाँ मेरी चर्चा नहीं है.
छपरा की मिट्टी पे जो भी फूल खिला
उसे हवाओं ने बांधा तो नहीं है.
परमीत सिंह धुरंधर