मैं फिसल जाउंगी


ऐसे हमसे ना
टकराना बलम
बाली उम्र है
मैं मचल जाउंगी।

दूर से यूँ ही बस
मिलाना नजर
बाली उम्र है
मैं बहक जाउंगी।

रोज सोती नहीं है
मेरी माँ यही सोचकर
की कब और कहाँ?
मैं फिसल जाउंगी।

माँ नहीं जानती की मेरे दिल में
है वो छपरा का धुरंधर
जिसके साथ एक दिन
मैं डोली चढ़ जाउंगी।

छपरा का मल्लाह


धोबन इतना ना इठला
अपने जोबन पे.
बड़ी किस्मत से मिलता है
किसी को छपरा का मल्लाह।

मैं नहीं इठलाती
मेरी कमर ही लचक रही.
रखती हूँ जिसपे
छपरा के धुरंधर को बाँध के.

परमीत सिंह धुरंधर

एक बिंदी बन के


प्रेम कितना विवश कर देता है
दो नयनों से ह्रदय को हर के.
वो तो रख लेती हैं उपवास
हम रह जाते हैं बस एक चाँद बन के.

वो चलती हैं सज के – संवर के
बाँध के साड़ी अपनी कमर से.
हम रह जाते हैं बस
उनके माथे की एक बिंदी बन के.

परमीत सिंह धुरंधर

समंदर


जब दिल टुटा
तो ए समंदर
मैं भी तुम्हारी तरह लहराया।

परमीत सिंह धुरंधर

रसोई का आंटा, आंटे की लोई और लोई की रोटी


वो मित्र बनें
वो शत्रु बनें
वो प्रेमी बनें
वो भाई बनें
दिन के धागे
और रातों सुई बनें।
एक हम ही हैं
जो कुछ ना बन सके।

वो दिल बनें
वो धड़कन बनें
वो दिमाग बनें
वो नजर, तंत्रिका
रुधिर और कोशिका बनें।
वो रसोई का आंटा
आंटे की लोई
और लोई की रोटी बनें।
एक हम ही हैं
जो कुछ भी ना बन सके.

वो किताब बनें
वो कॉपी बनें
वो कलम बनें
सीने से चिपक – चिपक कर
वो दुप्पट्टा
फिर रजाई
और फिर रजाई की रुई बनें।
एक हम ही हैं
जो कुछ बी ना बन सके.

परमीत सिंह धुरंधर

एक सिहरन


नयना जब तुमसे मिले
तो एक सिहरन सी उठी अंग-अंग में मेरे
और मैं संवर गयी.
सखियाँ मेरी जो ना समझी
मेरे ह्रदय को
देख के दर्पण
मैं स्वयं वो सब समझ गयी.

परमीत सिंह धुरंधर

पूछ इन खगचरों से


कौन कहता है की मुझे तुमसे मोहब्बत नहीं?
जरा पूछ इन खगचरों से
जिनके साथ मैं तुझे पाने को उड़ा
की आसमा में कहीं भी सुराख नहीं है.

परमीत सिंह धुरंधर

यह कुरुक्षेत्र है दोस्तों


दिल से लीजिये
दिल नहीं है तो
दिमाग से लीजिये
मगर फैसला तो लेना ही होगा।
यह कुरुक्षेत्र है दोस्तों
हौसला नहीं भी हो तो लड़ना ही होगा।
पलट तो सकते नहीं
मुख को मोड़ सकते नहीं
सोचने – समझने का अब कुछ नहीं
हाथ में अपने कुछ नहीं
कर्म का अब वक्त नहीं
सब निश्चित और सुनिश्चित है
उसको बदल पाना अब मुमकिन नहीं।
हसरतें, चाहतें सब छोड़कर
इरादों को बुलंद करना ही होगा।
यह कुरुक्षेत्र है दोस्तों
हौसला नहीं भी हो तो लड़ना ही होगा।
जो सम्मुख हैं
वो विमुख हैं
जो संग हैं खड़े
वो तो अप्रत्यक्ष हैं
अपने लक्ष्य के भेदन के लिए
अपने गांडीव पे तीरों का अव्वाहन करना ही होगा.
यह कुरुक्षेत्र है दोस्तों
हौसला नहीं भी हो तो लड़ना ही होगा।

परमीत सिंह धुरंधर

भीष्म सा तुमसे ठुकराई ना जाऊं


सोचती हूँ उम्र तुम्हारी बाहों में गुजार दूँ
पर डरती हूँ कहीं एक पत्थर ना बन जाऊं।
मैं भी देखती हूँ तुम्हे
तिरछी नज़रों से
पहचान लेती हूँ तुम्हे दूर से ही
तुम्हारे मुख, सीना, कन्धों
और टांगों की परछाई से
अच्छे लगते हैं तुम्हारे कहे
छेड़खानी के वो गंदे – शब्द
थक -हारकर सोचती हूँ
तुम्हारा घर बसा दूँ
पर डरती हूँ कही मैं ही अपने पंख न खो दूँ.
सीता जैसी सती से जब ली गई अग्नि-परीक्षा
द्रौपदी जैसी वधु को
जब समझा गया चौरस का एक पासा
सोचती हूँ इन सबसे गुजर जाऊं
तुम्हारे एक छुअन के लिए
पर डरती हूँ कहीं भीष्म सा तुमसे ठुकराई ना जाऊं।

परमीत सिंह धुरंधर

टकटकी


पतली कमर और डगर पतली
कैसे संभालोगी अपनी गगरी?
रखवार मेरा है छपरा का धुरन्धर
तुझ जैसे बिलाड़ लगाएंगे बस टकटकी।

परमीत सिंह धुरंधर