तेरे नयन है मेरे सघन वन
जिसमे विचरण करता है मेरा मन.
तू ना जाने क्या ढूंढती है जग में?
जब तुम्हारे लिए ही है मेरा उपवन।
काले – काले मेघों को
बाँध के अपनी जुल्फों में
फिर भी प्यासी -प्यासी हो
जाने किसकी चितवन में?
परमीत सिंह धुरंधर
तेरे नयन है मेरे सघन वन
जिसमे विचरण करता है मेरा मन.
तू ना जाने क्या ढूंढती है जग में?
जब तुम्हारे लिए ही है मेरा उपवन।
काले – काले मेघों को
बाँध के अपनी जुल्फों में
फिर भी प्यासी -प्यासी हो
जाने किसकी चितवन में?
परमीत सिंह धुरंधर
अतः हे रही
राह का चुनाव कर
मंजिलो का क्या है?
वो तो हैं ही वेबफ़ा।
कठिन है जीवन साकी के बिना
सरल भी नहीं, अगर साकी बन जाए मधुशाला।
परमीत सिंह धुरंधर
ए जोगी तनी हमरो से रचाई ना व्याह
अंग-अंग खिल के जोहे राउर राह.
छोड़ दी हिमालय के तराई में तरपाल
बिछा के खटिया आईं
रउरा के खिलाई ताजा – ताजा पकवान।
अभी संजोग बा, अभी उम्र बा
ढल जाए जवानी तो रहें पच्छ्तात
फेन ना आई इ छपरा के पोठिया रउरा हाथ.
रोजे पठावत बारन बायना छपरा के धुरंधर Crassa
को छोड़ के जोगी तहरा के,
चढ़ जाइ हम डोली अब Crassa के साथ.
परमीत सिंह धुरंधर
कठिन है जीवन मधु के बिना
सरल भी नहीं, अगर मिल जाए मधुशाला।
Dedicated to Shir Harivansh Rai Bachchan.
परमीत सिंह धुरंधर
अभी तो तुम दुल्हन सी मासूम हो
कल से बन जाओगी प्रचंड – भयंकर।
अभी तुम्हारी निगाहें शर्म से झुकीं हैं
कल से उगलेंगी ये ज्वालायें निरंतर।
किसने लिखा है जाने क्या सोचकर तुम्हे अबला?
शरण में तुम्हारे स्यवं है महादेव – महेश्वर।
माया के आगे तुम्हारे भला कौन इस जगत में?
तुमसे बड़ा ना कोई हुआ ब्रह्माण्ड में धुरंधर।
हर किसी की नजर जवानी पे है
बस हम ही हैं सनम जो नादानी पे है.
सब हैं यहाँ दिल जीतने को तेरा
बस हम ही हैं सनम जो दिल हारने पे है.
दौलत – शोहरत, क्या नहीं?
ये तेरे दामन को चाँद -तारों से सजा देंगे।
बस हम ही हैं सनम जो तेरे नखरे उठाने पे हैं.
ना पूछा कर हमसे,
क्या कर सकते हैं तेरे लिए?
जहाँ से सब तेरा साथ छोड़ दे,
वहाँ से हम निभाने पे हैं.
परमीत सिंह धुरंधर
नुसरत फ़तेह अली खान साहेब ने बेवफाई के दर्द को भक्ति के आनंद में बदल दिया है. टूटे दिल को भी जब दर्द में झूम उठने का संगीत मिले तो वही भक्ति है.
परमीत सिंह धुरंधर
जानता हूँ तुम्हारा हर इरादा सनम
इस चांदनी रात में, किससे वादा किया है
और किससे आज मिलने जाओगे?
Dedicated to Nusrat Fateh Ali Khan
परमीत सिंह धुरंधर
रूप और धुप दोनों पल – दो – पल के मेहमान हैं
ढलते हैं, तो बचता कोई नहीं इनका निशाँ हैं.
वृक्ष अगर साथ हो तो फिर धुप भी मीठी छावं हैं
वफ़ा में घुला रूप तो अमृत सामान है.
परमीत सिंह धुरंधर
समंदर को बाँध लिया मैंने
कलंदर को बाँध लिया मैंने
बस एक वो ही ना बंध सके हमसे
दिलो -जान से जिससे मोहब्बत किया मैंने.
Dedicated to my favorite poet Shiv Kumar Batalvi.
परमीत सिंह धुरंधर