महराणा से Crassa तक


वीर कई धरती पे हुए
पर महराणा सा न कोई वीर हुआ.
हम राजपूतों की विरासत है ये
हमने देश के लिए घास खाया।
हम राजपूतों की विरासत है ये
ना सर झुकाया, ना देश छोड़ा।

कोई नहीं था जो
टिक जाता खडग के आगे.
महाराणा ने जिस खडग को
अपने बाजुओं का बल दिया।
हम राजपूतों की विरासत है ये
ना सर झुकाया, ना देश छोड़ा।

ना नरम बिछोना
ना मदिरा का पान किया।
कतरे – कतरे से लहू के अपने
हमने माँ का श्रृंगार किया।
हम राजपूतों की विरासत है ये
हमने देश के लिए घास खाया।

महराणा से Crassa तक
सबने है इतिहास रचा.
हम राजपूतों की विरासत है ये
हमने प्रेम में सबका मान रखा.
हम राजपूतों की विरासत है ये
ना सर झुकाया, ना देश छोड़ा।

परमीत सिंह धुरंधर

यौवन


इंसान तेरे क़दमों की बस यही एक कहानी
रुक जाएँ तो, कौन साथ इनका मांगता?

धुप में जो रूप खिले, ऐसा यौवन है वो
शीत के चाँद को कौन आँगन से है देखता?

परमीत सिंह धुरंधर

श्री हरी विष्णु


तुम करुणामयी भक्तवत्सल
तुम धर्म का आधार हो.
सर्वव्यापी, निरंतर, अचर-अगोचर तुम
तुम सनातन साकार हो.
मैं मुर्ख -अज्ञानी – पापी
मुझे क्षमा करो, मेरा उधार हो.
सृष्टि के आदिकर्ता, पालक – संहारक तुम
तुम ब्रह्म निराकार हो.
जीव – अजीव सब तुममे समाहित
तुम कण – कण में विराजमान हो.

परमीत सिंह धुरंधर

मोदी विजय – गाथा 2019


मन भी समर्पित, तन भी समर्पित
ए धरती तेरे लिए.
लौट के फिर से आया हूँ
माँ, तुझको ही सजाने के लिए.

ख्वाब मेरा है, अरमान मेरा है
कोना – कोना लहलहा दूँ फसल से
विश्वास रखो भारत के किसानों
मोदी खड़ा है सिर्फ तुम्हारे लिए.

साँसे हैं जबतक इस तन में
ख्याल रखूंगा जन – जन का.
लौटा हूँ आशीष लेकर
बाबा केदारनाथ जी से
हिन्द के वीर जवानों के लिए.

मन भी समर्पित, तन भी समर्पित
ए धरती तेरे लिए.
लौट के फिर से आया हूँ
माँ, तुझको ही सजाने के लिए.

परमीत सिंह धुरंधर

शोहरत


अभी इतना भी तन्हा नहीं हुआ है Crassa
उनके शोहरत में शामिल अंगों को है मैंने गढ़ा.

परमीत सिंह धुरंधर

हुस्न बेमिसाल था


इश्क़ ना उनसे हुई तो नशा किताबों में ढूंढा
नाम शमा हासमी तो दुआ मजारों पे पढ़ा.

किस्मत से जंग में फ़कीर है हर कोई
उनका हुस्न बेमिसाल था तो साथी दौलत को चुना।

परमीत सिंह धुरंधर

रुमाल


मुस्करा – मुस्करा कर वो किताब दे गयीं
कभर पे जिसके लिखा था फिजिक्स
अंदर वो अपना रुमाल दे गयीं।

परमीत सिंह धुरंधर

भंवर


वो किताबों के मेरे पन्ने बने हैं
वो शहर की मेरी दुकानें बने हैं.

ढूंढती है जिसे नजर मेरी प्यासी
वो ख़्वाबों के मेरे समंदर बने हैं.

वो मासूम सा चेहरा
छोड़ गया मुझे भंवर में
जिसके लिए हम दीवाने बने हैं.

These lines are for someone from Raebareli.

परमीत सिंह धुरंधर

हाले – जिंदगी


दास्ताने – जिंदगी तो सबने लिखी है
मैं पढ़ने बैठा हूँ दास्ताने – जिंदगी।

शौक समंदर का रखता हूँ
इस शौक ने कर दिया तन्हा जिंदगी।

उलझनों में उलझ के जो थम जाते हैं
कब कोई उनसे पूछता है फिर हाले – जिंदगी?

उनकी निगाहों को देख समझ गया था
ख़ाक के सिवा कुछ नहीं मोहब्बत में जिंदगी।

दुवाओं का असर है या कर्म का फल है
बेगानों की बस्ती में अब तक टिकी है जिंदगी।

परमीत सिंह धुरंधर

गरीबों की सुन ले ए दाता-III


टूटे हैं सारे ख्वाब इनके
बनके आँसू
छलक -छलक के.
जाने कैसे ज़िंदा हैं ये
जीवन में इतना भटक – भटक के.
कौन तोड़ेगा इनकी बेड़िया
एक तेरे सिवा
गरीबों की सुन ले ए दाता,
इनका कोई नहीं, तू विधाता।
इनकी आँखों के आगे
रहता है बस अँधेरा।
गरीबों की सुन ले ए दाता,
इनका कोई नहीं, तू विधाता।

परमीत सिंह धुरंधर