मैं कोमल – कुमुदुनी हूँ – II


न व्यर्थ करो मेरे जीवन को
अपने गर्व के आवेश में
तुम दम्भ से ग्रसित गजराज हो
मैं शर्म से संकुचित तरुणी हूँ.

तुम यश – गाथा के लालसी
मैं अंक की तुम्हारे अभिलाषी हूँ.
ना खेलो मेरे ह्रदय से
मैं कोमल – कुमुदुनी हूँ.

परमीत सिंह धुरंधर

मैं कोमल – कुमुदुनी हूँ


ना खेलो मेरे ह्रदय से
मैं कोमल – कुमुदुनी हूँ.

अपना बना लो मुझे
आतुर मैं प्रचंड अग्नि हूँ.

व्यर्थ न करो मेरे तन – मन को
मैं तुम्हारी जीवन – संगिनी हूँ.

क्या प्राप्त कर लो गे, गंगा-पुत्र?
इस प्रतिज्ञा को पाल कर.
भीष्म तो बन जाओगे
पर मैं तुम्हारी अधूरी – जिंदगी हूँ.

मेरी साँसों में प्रवाहित हो तुम
मैं ही तुम्हारी अर्धांगिनी हूँ.

परमीत सिंह धुरंधर

गरीबों की सुन ले ए दाता-II


गरीबों की सुन ले ए दाता,
इनका कोई नहीं, तू विधाता।
जब जीना ये चाहते हैं,
साँसे टूट जाएँ,
जब पीना ये चाहते हैं,
दरिया सुख जाए.
इनके बस में कही कुछ भी ना,
एक तेरे नाम के सिवा।
गरीबों की सुन ले ए दाता,
इनका कोई नहीं, तू विधाता।

बड़े भोले है ये, बड़े निश्छल है ये
पल में छल जाते हैं, पल में बिक जाते हैं
पल में प्रेम में बंध के यहाँ।
गरीबों की सुन ले ए दाता,
इनका कोई नहीं, तू विधाता।
तू छलता रहे, तू ठगता रहे, शिकवा नहीं तुझसे
इस छलावे में ही तो है जीवन की सारी माया।
गरीबों की सुन ले ए दाता,
इनका कोई नहीं, तू विधाता।

तू भी जी के गया, बनके मानव यहाँ
तुझको है पता, जीवन की हर एक पीड़ा।
गरीबों की सुन ले ए दाता,
इनका कोई नहीं, तू विधाता।
किसको पुकारूँ, किससे माँगूँ सहारा?
पग को मेरे जल में, ग्रह ने है बांधा
छोड़ो निंद्रा बैंकुठ के स्वामी
ललाट तक भक्त है अब डूबा।
गरीबों की सुन ले ए दाता,
इनका कोई नहीं, तू विधाता।

बेबस, लाचार,
अपने शर्म से ही खुद मर जाते हैं.
कोई दुआ नहीं, कोई दया नहीं,
जीवन में इनके,
बस तेरी एक आस के सिवा।
गरीबों की सुन ले ए दाता,
इनका कोई नहीं, तू है विधाता।
क्या माँगूँ तुझसे और तेरे दर पे?
मेरे आंसुओं है तेरा साया।
गरीबों की सुन ले ए दाता,
इनका कोई नहीं, तू विधाता।

गरीबों की सुन ले ए दाता,
इनका कोई नहीं, तू विधाता।
जब जीना ये चाहते हैं,
साँसे टूट जाएँ,
जब पीना ये चाहते हैं,
दरिया सुख जाए.
इनके बस में कही कुछ भी ना,
एक तेरे नाम के सिवा।
गरीबों की सुन ले ए दाता,
इनका कोई नहीं, तू विधाता।

परमीत सिंह धुरंधर

तू पगली कैसी पागल है?


तू पगली कैसी पागल है?
जो विरहा में गाती है.
पहन के चूड़ी, और नई साड़ी
गली – गली इठलाती है.

तू पगली कैसी पागल है?
जो विरहा में गाती है.
बिना बालम के अंक के ही
नित पुष्प सी खिल जाती है.

तू पगली कैसी पागल है?
जो विरहा में गाती है.
एक चिठ्ठी पाकर ही उनकी
जो तितली सी उड़ जाती है.

तू पगली कैसी पागल है?
जो विरहा में गाती है.
देख के उनको दुआर पे अपने
दर्द-गरीबी, सब भूल जाती है.

तू पगली कैसी पागल है?
जो विरहा में गाती है.
स्वर्ण-चांदी, आभूषण-रहित अंगों को
अपने आँचल में छुपाती है.

परमीत सिंह धुरंधर

तितली


सुनहरी तस्वीरें सुनहरी ही रहेंगी,
तू मेरी न सही, पर किसी की तो बनेगी।

सिख ले तू किसी से वफ़ा थोड़ी सी कभी
कब तक यूँ तितली बनकर उड़ती रहेगी?

तोड़ना – उजाड़ना लड़कपन का है खेल
दूसरे के दर्द पर तब तक तू इठलाती रहेगी।

बांध ले खुद को किसी के मोहब्बत में
कब तक जवानी अपनी लुटाती रहेगी।

परमीत सिंह धुरंधर

P. V. Narasimha Rao and Narendra Modi: Both destroyed opposition


P. V. Narasimha Rao ने विपक्ष को उठा – उठा के पटका। Therefore, whole opposition were against him.
मोदी जी विपक्ष को उठा – उठा के पटक रहें हैं. Therefore, the whole opposition is against him.
चंद्रशेखर ने पक्ष -विपक्ष को भावहीन कर दिया। Therefore, his party and partymen (1977 Janta Party, 1989 Janda Dal, and 1996 Janta Dal) choose Morar Jee, V. P. Singh, and Deve Gowda as PM. Jay Prakash Narayan choose Morar jee as PM and then told Chandrashekhar that he wanted Chandrashekhar from the first day.
सुब्रमनियन स्वामी ने हर राजनीतिज्ञ को धो – धो के पटका है या हर राजनीतिज्ञ को स्वामी जी से ये खतरा रहता है. Therefore, Janta Party ignored him in 1977, Janda Dal ignored him in 1989, Chandrashekhar preferred him as his Minister of Commerce, Atal jee refused Jayalalithaa’s request for him as a Minister of Finance and Modi jee kept him out of his cabinent.

Parmit Singh Dhurandhar

आनंद


जो पतित है, वही पावन भी है.
जो मलिन है वही पारस भी है.

जलता है दिया जमाने के लिए
पर उसके लिए बस अन्धकार ही है.

क्या माँगूँ खुदा तेरे दर पे यहाँ?
जब आंसुओं में मेरे तेरा साया भी है.

तू जी कर गया, बनके मानव यहाँ
पता है तुझे, इस पीड़ा में ही प्यार भी है.

तू ठगता रहे, तू छलता रहे, शिकवा नहीं तुझसे
इस छलावे में ही मिलता आनंद भी है.

एक ही खुदा सबका, एक ही पीड़ा सबकी
इसी पीड़ा ने तुझसे सबको बांधा भी है

परमीत सिंह धुरंधर

जन – जन के ह्रदय में हैं श्रीराम


जब श्रीराम को आना होगा
श्रीराम आयेंगे।
अत्याचारी से कह दो
संग हनुमान जी भी आयेंगे।
जब मंदिर बनना होगा
मंदिर बन जाएगा।
जन – जन के ह्रदय में हैं श्रीराम
ह्रदय से कैसे मिटाओगे?

इस माटी का रंग उनसे
इस माटी की खुशबु हैं श्रीराम।
मीठी हो जाती है धुप भी
अगर लिख दें
हम आँगन में श्रीराम।
घर – घर में बसे हैं
हनुमान-ध्वज में श्रीराम
घर – घर से कैसे मिटाओगे?

परमीत सिंह धुरंधर

क्यों Fair & Lovley ढूंढती हैं?


नदिया हमसे
ये सवाल पूछती है.
किसके पाँव पखारूँ?
वो नाम पूछती है.

पत्थर बन गया
एक सुन्दर सी नारी
फिर क्यों भारत की लड़कियाँ
Fair & Lovley ढूंढती हैं?

यहाँ पत्थर पे भी
तुलसी चढ़ती है.
फिर क्यों भारत की लड़कियाँ
Fair & Lovley ढूंढती हैं?

परमीत सिंह धुरंधर

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय क्या है?


हमसे बोलो
तुम्हे क्या चाहिए?
तुम पुत्र मेरे हो
तुम्हे ला के हम देंगें।
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय क्या है?
पुत्र तुम्हारे लिए
काल से भी हम टकरायेंगे।

पाकर तुम्हे प्रफुलित मन है
विराट होने का यही क्षण है
नस – नस में तुम्हारे
लहू है मेरा
नस – नस को तुम्हारे तृप्त करेंगे।
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय क्या है?
पुत्र तुम्हारे लिए
काल से भी हम टकरायेंगे।

अधूरा है आनंद का हर एक पल
जो मुस्कान न हो तुम्हारे मुख पे
चल कर खुद काँटों पे
पुत्र तुम्हारे लिए
हम हर पुष्प खिलायेंगे।
जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय क्या है?
पुत्र तुम्हारे लिए
काल से भी हम टकरायेंगे।

धुरंधर – सुशीला के
लाल हो तुम
तुम्हें यूँ तो व्याकुल
नहीं देख पायेंगे।
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय क्या है?
पुत्र तुम्हारे लिए
काल से भी हम टकरायेंगे।

भीषण होगा युद्ध
और वृद्ध हम होंगे
तब भी समर में
पुत्र तुम्हे
अकेला तो नहीं भेजेंगे।
जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय क्या है?
पुत्र तुम्हारे लिए
काल से भी हम टकरायेंगे।

प्रिये हो तुम पुत्र, अति हमें
ये प्यार किसी और को
तो हम फिर ना दे पायेंगे।
जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय क्या है?
पुत्र तुम्हारे लिए
काल से भी हम टकरायेंगे।

In the memory of my father Dhurandhar Singh.

परमीत सिंह धुरंधर