वो इतने करीब से निकल गई


वो इतने करीब से निकल गई,
अंजान बनके।
मोहब्बत थी, बरना चुनर उड़ा लेते,
हैवान बनके।
अब इशारों -इशारों में रह गई जिंदगी,
सुखी, उदास, गुलाब की पंखुड़ियों सी,
किताबों में बंध के.

 

परमीत सिंह धुरंधर

तुम करवट भी लोगी


तुम्हे इतने प्यार से रखूँगा समेट के,
की तुम करवट भी लोगी तो, मेरे बाहों में.
मेरी ओठों से तुम्हारी ओठों का न होगा फासला,
तुम साँसे भी लोगों तो मेरी साँसों से.

 

परमीत सिंह धुरंधर

काले हम हो गए


जमाना आज भी कहता है,
की वो खूबसूरत बहुत हैं.
किसी को क्या पता?
उनके काजल से काले,
हम हो गए.

 

परमीत सिंह धुरंधर

दिया वो ही बुझाते हैं


दिया वो ही बुझाते हैं,
जो शर्म का ढिढोंरा पीटते हैं.
जहाँ जमाना चुप हो जाता है,
हम वहाँ अपनी आवाज उठाते हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

जवानी उनपे चढ़ी


अर्ज किया है दोस्तों,
की जवानी उनपे चढ़ी,
और बर्बाद हम हो गए.
लुटा हमें उसने जी भरकर,
और जमाने भरके,
गुनाहगार हम हो गए.

 

परमीत सिंह धुरंधर

आपन गावं के चिड़िया रहनी


अइसन -वइसन खेल ए राजा,
मत खेल आ तू हमारा से.
आपन गावं के चिड़िया रहनी,
लुटले रहनी कतना खेत बाजरा के.
जाल बिछा के कतना शिकारी,
रहलन हमरा आसरा में.
अइसन घुड़की मरनी,
हाथ मल आ तारन आज तक पांजरा में.
अइसन -वइसन चाल ए राजा,
मत चल आ तू हमारा से.
आपन गावं के खिलाड़ी रहनी,
कतना के पटकनी दियारा में.
ढुका लगा के बइठल रहलन,
कतना चोर चेउंरा में.
अइसन दावं मरनी,
आज तक दर्द उठेला उनकर जियरा में.

 

परमीत सिंह धुरंधर

धरुंगा तुम्हे मैं प्रिये


जिस दिन धरा पे,
धरुंगा तुम्हे मैं प्रिये,
नभ तक हलचल होगी हाँ.
तारों-सितारों की महफ़िलों का क्या?
कलियाँ भी खिल कर चूमेंगी तुम्हे हाँ.
एक दिन उठूंगा,
मैं दलित-कुचलित,
उठाऊंगा तुम्हे अपनी बाहों में,
चुमुंगा, झुमके इसी महफ़िल में हाँ.
जो हँसते हैं वो हंस ले,
हंसा लें खुद को,
मुझे यकीन हैं,
की एक दिन वो दिन आएगा हाँ.

 

Parmit Singh Dhurandhar

दोनों की जवानी ही ऐसी है


वो बड़ी मशहूर हैं,
मैं बड़ा मगरूर हूँ.
दोनों की जवानी ही ऐसी है,
की नजरें एक – दूसरे पे,
बस जिस्म-जिस्म दूर-दूर है.
जो हसतें हैं Crassa पे,
वो क्या जाने?
हम रातो को कितना मसरूफ हैं.
वो हो गई किसी की,
मगर उनकी पतली कमर पे,
ये दिल आज भी मजबूर है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

बलखना किसे कहते हैं ?


बेहयाई का ऐसा है दौर दोस्तों,
दिल में कोई और, जिस्म पे कोई और दोस्तों।
हमसे पूछो बलखना किसे कहते हैं ?
जो कल तक मेरी थी, अब किसी और की दोस्तों।

 

परमीत सिंह धुरंधर

अपना सब उतार गईं


दास्ताने-मोहब्बत क्या कहें,
वो सूरते-बाज़ार में बिक गईं.
कुछ ऐसे जिस्म की चाहत थी,
की वो सैकड़ों की बाहों में झूल गईं.
हुस्न के इसी रंग पे,
ख्वाब बिकते हैं.
उनकी साड़ी, काजल पे हमने लुटाएं पैसे,
और वो किसी के पैसों पे,
साड़ी, काजल, अपना सब उतार गईं.

 

परमीत सिंह धुरंधर