गोरी तहरे जोबना के भार से आइल बा देल्ली में भूचाल रे,
गोरी तहरे जोबना के भार से आइल बा देल्ली में भूचाल रे,
मयकदा और ये जाम तो है, हारे हुए सल्तनतो के लिए,
लूटा हुआ ये फकीर धुरंधर सिंह शौक रखता है आज भी तेरी लबो का.
किसी और की नाराज़गी से,
इंसान बंदगी तो नहीं छोड़ सकता।
मोहब्बत पे मर मिटने वाला,
आशिकी तो नहीं छोड़ सकता।
वो और हैं जिससे मोहब्बत पसंद ना होगी,
उनसे सहम कर धुरंधर सिंह,
अपनी दीवानगी तो नहीं छोड़ सकता।
वो क्या मेरे दर्द को समझेंगी जो दिलो से खेलती है,
अंदाजे-रुख बयां करते है की इस सहर में कोई तो नया है, परमीत
प्यार तभी सफल हो सकता है जब आप संत बन जाये, परमीत.
अगर कजरा उनसे जो कर दे शिकायत,
तो कजरे को काली कहेंगी।
जो मैं कर दूँ उनके हुश्न की तारीफ़,
तो आगे बढ़ के मुझको गाली पढ़ेंगी।
अगर गजरा उनसे जो कर ले मोहब्बत,
तो इसे गजरे की नादानी कहेंगी।
जो मैं थाम लूँ लहर अपने दिल की,
तो इसे धुरंधर की ठंडी जवानी कहेंगी।
वो सजती हैं खुद को ही देख आईने में,
अपने योवन पे इठलाती हुई.
अगर आईना कह दे जो सच्चाई,
तो फिर उसे बस सीसा कहेंगी।
जो मैं सूना दूँ हाले दिल उन्हें अपना,
तो फिर मुझे एक झूठा ही कहेंगी।
मिलती है वो सबसे हंस के हंसा के,
बस रखती है हमसे ही दूरियां।
जो मैं पूछूं राज उनके इस भेद का,
तो अपनी अदा को वो हया ही कहेंगी।
जो थाम लूँ मैं बढ़ के कलाई,
तो परमीत को बेहया ही कहेंगी।
चलती हैं ढलका के आँचल को सीने से,
और परचित की इसे शैतानी कहेंगी।
जो मैं मिटा दूँ उनपे अपनी जिंदगी,
तो जवानी की मेरी ये नादानी ही कहेंगी।
इस कदर तू पिला मेरे साकी,
की जीने की तमन्ना फिर से बने.
जाते- जाते भी तेरे दर से,
खुसबू तेरी ही दामन में रहे.
काले चादर में लिपटी,
मेरी दुल्हन आ रही है.
की उसके आगोस में जा कर भी,
धुरंधर के सीने में तेरी यादे रहे.
तुमने तो सारी उम्र गुजार दी,
और अब शादी की बात करते हो.
अभी तो मैं जवान हूँ,
और तुम मुझसे ऐसी बात करते हो.
अभी तो मैं खेलूंगी, खिलाऊँगी,
अपनी अदाओं पे सबको नचाउंगी,
अभी तो मैं प्रियंका-कटरीना हूँ,
और तुम मुझसे,
बिपाशा-करीना की बात करते हो.
बेशर्म हो तुम, बेहया हो तुम,
मैं तुम्हे अब क्या कहूँ?
बेगैरत हो तुम.
अभी तो मैं छलकती,
आलिया हूँ.
और तुम मुझमे,
प्रीटी और रानी ढूंढते हो.
तुमने तो सारी उम्र गुजार दी,
और अब तुम धुरंधर,
मुझसे शादी की बात करते हो.
परमीत सिंह धुरंधर
इम्तहान मेरे जीवन की,
कब होगी मेरे ईस्वर,
मैने उनको चुन लिया है,
वो कब चुंनेंगी ईस्वर।
हाथों में चूड़ी है,
आँखों में काजल,
कानो में कुण्डल है,
पावों में पायल,
की कंगन मैंने खरीदे हैं,
वो कब पहनेंगी मेरे ईस्वर।
इम्तहान मेरे जीवन की,
कब होगी मेरे ईस्वर,
मैने उनको चुन लिया है,
वो कब चुंनेंगी ईस्वर।
बादल बरसते कितने मिलें,
उपवन में कितने ही फूल खिलें,
जो मन को मेरे छू ले,
वो कहाँ है शूल,
ह्रदय-आघात तो बहुत मिलें,
वो कब हृदय को सिचेंगी मेरे ईस्वर।
इम्तहान मेरे जीवन की,
कब होगी मेरे ईस्वर,
मैने उनको चुन लिया है,
वो कब चुंनेंगी ईस्वर।
राते जब आ-आके,
करती हैं मुझसे बाते,
तो सीने में उठती हैं,
लाखो जज्बातें,
की बासुरी तो बजा दी है प्रेम की,
धुरंधर ने,
वो मीरा बनके कब नाचेंगी मेरे ईस्वर।
इम्तहान मेरे जीवन की,
कब होगी मेरे ईस्वर,
मैने उनको चुन लिया है,
वो कब चुंनेंगी ईस्वर।