अभी- अभी तो दिल तोड़ा है,
तेरे नैनों के मयखाने में.
फिर क्यों पूछती हो दिलरुबा,
हाल मेरा इस जमाने से.
बदल लिया है परमीत ने धड़कनो को,
तेरी खुशियों की खातिर.
फिर क्यों हो इतनी आतुर,
आने को मेरे जनाजे में.
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सुनहरे पल
सुनहरे पलों की याद में,
कुछ पल इस कदर गुजर गए,
की वफ़ा की उमिद्द में हम,
वेवफाई पे उतर गए.
वो मुस्करा कर बोली की,
तुमने मुझे ठगा तो जरुर,
पर एक दिन,
पछताओगे परमीत इस जमाने में,
इसी एतबार से, हम तुम्हे छोड़ रहें.
कालिदास की वो नारियां
कृषि महाविधालय के प्रांगण में,
जब कल लहरा रही थीं,
रंग-बिरंगी साड़ियां।
तो ऐसा लगा जैसे,
धरती पे आ गयी हैं,
सवर्ग से उतर कर,
कालिदास की वो नारियां।
एक सुन्दर सी साड़ी में,
लिपटा तुम्हारा बदन,
ऐसा लगा जैसे झूम रहा हो,
सारा उपवन।
वो तुम्हारा लहराता हुआ आँचल,
सागर की सैकड़ो लहरे थीं,
या खेत में लहलहाती,
गेहूं की हज़ारों बालीं।
जो भी था वो मंजर,
बहुत मनलुभावन था।
अब बस इतनी सी इल्तिजा है,
की अब जब निकालना,
फिर से इन गलियों में,
तो बसा लेना आँखों में,
हल्का सा वो काजल,
और बाँध लेना,
पाँवों में वो पायल।
ताकि गूंज उठे,
इन गलियों में,
फिर से वो ही तराना,
कहते है परमीत,
जिसे हम जैसे आशिक़
वो गुजरा हुआ जमाना।
Lebanon की एक लड़की
Lebanon की एक लड़की,
Lobster खाती हुई,
हौले-हौले मेरे दिल में,
उतरती गयी.
आँखों में आँखे डाल के,
Red wine गटकती हुई,
हौले-हौले मेरे दिल में,
उतरती गयी.
ओठों पे लिए खनकती हंसी,
घुंघराले बालो को लहराती हुई,
हौले-हौले मेरे दिल में,
उतरती गयी.
जब हमने नजरे डाली,
कही और, तो परमीत
खुद में ही, खुद से ही,
जलती हुई.
Lebanon की एक लड़की,
Lobster खाती हुई,
हौले-हौले मेरे दिल में,
उतरती गयी.
हुस्न
जो रातों में मिलता है,
इतना करीब आके,
वो दिन के निकलते ही,
इतना अनजान क्यों है.
पिघलता है जो वर्फ सा,
शाम के ढलते ही,
वो सूरज की किरणों के,
आते ही,
यूँ पत्थर सा क्यों है.
कहते हैं सब,
नाजुक होता है दिल,
आँचल में रहने वालों का,
फिर,
दूसरों के दर्द पे,
वो परमीत,
इतना मुस्कराता क्यों है.
लाहौर के बादल
वो लाहौर की हैं,
या फिर कराची से,
दिल कहता है,
की कोई रिश्ता है,
उनका मेरे काशी से.
आँखों में वही,
काजल हैं,
जो उड़ता है,
धुंवा बनके,
अब भी मेरे,
गाछी में.
एक नजर से ही,
वो अपने,
सोंख गयीं,
दिल में उठती,
गंगा की हर,
धारा को.
बादल उठें है ये,
पेशावर से,
या बलूचिस्तान से,
पर बरस रहे हैं, परमीत,
ये तेरे,
दिले-हिंदुस्तान पे.
त्रिया-चरित्र
घर दुआर छोड़ के,
हो गईलन सन्यासी,
फ़लेनवा के नाती हो,
फ़लेनवा के नाती।
सुनलेरनी उनकर,
भीरल रहल टंका,
तहरे से रानी हो,
तहरे से रानी।
बड़ों-बड़ों के बीच में,
करस तहार बखान हों,
देखअ उनकर बिकअता,
खेत आ खलिआन हों।
दबी जुबान में हर कोई कहे,
की उनकर,
भीरल रहल टंका,
तहरे से रानी हो,
तहरे से रानी।
छीन के आपने,
मेहरारून के पैजनियाँ,
बाँध देहलन तहके,
बनइलन दुल्हनियां।
की ओइसन,
राज कुमार से,
एगो सुकुमार से,
तुहुँ मंगवैलू,
भीख के दाना हो।
सुनलेरनी उनकर,
भीरल रहल टंका,
तहरे से रानी हो,
तहरे से रानी।
कतना लिखान भइल,
कतना पुराण भइल,
कोई न समझल,
ई त्रिया-चरित्र हो।
की कहतारन बाबू,
ईह परमीत सिंह,
की हम न करेम,
तहसे रानी ई प्रीत हो।
सुनलेरनी ताहर,
भीरल रहल टंका,
उनकरे से रानी हो,
उनकरे से रानी।
दिल्ली में बिल्ली
दिल्ली शहर में मेरी बिल्ली भी भाग गयी,
ऐसी भागी वैसी भागी दुनिया पूरी जान गयी.
मैंने खिलाया उसे भर पेट दूध-भात,
खुद ही काटी खली पेट जारी की रात.
पर वो भी निकली कमबख्त बदजात,
मुझ गरीब आशिक को ही लात मार गयी.
दिल्ली शहर में मेरी बिल्ली भी भाग गयी,
ऐसी भागी वैसी भागी दुनिया पूरी जान गयी.
कितना हम में था प्यार भरा,
कितनी रातों को हमने साथ काटा.
देख के एक मोटा-ताजा बिलाड़,
सब कुछ एक पल में सब भुला गयी,
मुझ गरीब आशिक़ पे ही आँखे अपनी तान गयी.
दिल्ली शहर में मेरी बिल्ली भी भाग गयी,
ऐसी भागी वैसी भागी दुनिया पूरी जान गयी.
परमीत सिंह धुरंधर
बेवफा
प्यार बिकता है इतना भी,
मैंने जाना न था हाँ कभी,
वो साड़ी में थीं मेरे,
पहने पायल किसी और की.
जिनकी तस्वीर सजाता था,
दीवारों पे अपने,
वो बाहों में थी मेरे, परमीत
सपने सजायें किसी और की.
परमीत और पराजय
ठोकर खायी मोहब्बत में जिस दिन,
मुझको भी नारी का ज्ञान हुआ,
अभिमान था मुझे अपने योवन पे,
पर मैं भी भीष्म सा पराजित हुआ.
लेकर जिनको बाहों के घेरे में,
मैं इतराता रहता था,
जब चौरस खेली उनके नाम की,
तो मैं भी युधिष्ठिर सा पराजित हुआ.
मैंने उखड़ा है कितने ही सर्पो के,
जबड़े से उनके दांतों को,
मगर बात आई जब मेरे जीवन की,
तो परमीत,
मैं भी परीक्षित सा पराजित हुआ.