अनाडी-बलमा


दरिया इतना उछलती है क्यों,
जरा हमको बता बलमा।
सागर इतना है गहरा हाँ क्यों ,
जरा हमको समझा बलमा।
कौआ आसमान में उड़ता है क्यों,
क्यों, फूलो पे मंडराएं भौरां।
कालिया खिलती हैं सुबह में क्यों,
जरा हमको बता बलमा।
सूरज बिखरायें किरणों को क्यों,
जरा हमको समझा बलमा।
बहती हवा का मुझे छू जाना,
क्यों, भाता है जुल्फों का लहराना,
गिराती हूँ मैं यूँ आँचल को क्यों,
जरा हमको बता बलमा।
परमीत, तू इतना है अनाडी हाँ क्यों,
जरा हमको समझा बलमा।

साजिस


कभी वो हुस्न थी,
और मैं इश्क था
आज वो बेचैन हैं,
और मैं शांत सा.
कभी वो रात थी,
और मैं ख्वाब सा,
आज वो दरिया हैं,
और मैं सागर सा,
कि वक्त ने जब भी,
कि हैं मुझे तोड़ने कि साजिस,
मिट जाने से पहले,
मैं उठा हूँ परमीत लहरो सा.

परमीत और मेनका


वो रात भर मेरी बाँहों में,
रक्त का संचार बनी,
मेरे हृदय कि धड़कने,
मेरी साँसों कि रफ़्तार बनी.
इन काली-काली रातो में,
मेरे जीवन का आधार बनी.
उड़-उड़ के उनकी जुल्फे,
गिरती  हैं  मेरे मुखड़े पे,
आँचल ढाल कर उनके काँधे से,
लिपटा है मेरे सीने से,
मासूमियत से दूर,
वो मेरी मुस्कान बनी.
इन काली-काली रातो में,
मेरे जीवन का आधार बनी.
अधखुली पलकों से,
वो देखती हैं मेरे तन को,
अभी भी दबी,
अपने सरमोहया के बोझ से.
उनके योवन कि खामोसी,
मेरी जवानी कि चीत्कार बनी.
पल में वो दूर जाती,
पल में पास आ रही,
अपनी जुल्फो कि उलझन से,
खुद उलझती जा रही.
उनकी ये विवसता,
मेरा राजपूती अहंकार बनी.
न रोसनी कि चाहत,
न उची उड़ान कि,
लगता हैं प्यारा अब ये अंधकार,
उनकी जुल्फे मेरी पाश बनी,
लो टूट रहा मेरा ब्रह्मचर्य परमीत,
वो मेनका-अवतार बनी.

साजन


कब तक मैं देखूं दर्पण को,
ए माँ कह दे बाबुल से,
अब मुझे पराया बना दें.
तू जो देती है यूँ रोज-रोज,
नयी-नयी मुझे चूड़ियाँ,
वो भी पूछती है रातों को,
कब बजेगी मेरी शहनाइयां.
कब तक मैं सोऊँ यूँ किवाड़ भिड़ा के,
ए माँ कह दे बाबुल से,
अब मुझे डोली में बिठा दें.
भाभी छेड़ती है,
घींच के चुनार मेरी,
सखिया पूछती है चिठ्ठी में,
कब मैं पता बदलूंगी.
कब तक मैं निकलूं, काजल लगा के,
ए माँ कह दे बाबुल से,
अब मुझे परमीत सा साजन दिला दें.

जवानी के दांव


जब से जवान भइल बारू,
गुलशन के आम भइल बारू।
ललचअ तारन केजरीवाल भी,
आ बुढऊ अन्ना के,
जी के जंजाल भइल बारू।
शीला के कईलु तू पानी-पानी,
ये ही उम्र में ममता के,
जी के घाव भइल बारू।
मोदी भी बारन धोती खोंट के,
बाबा राहुल के,
जवानी के दांव भइल बारू।

होली और सौतन


जब निकलती हूँ मै डाल के,
घूँघट अपने मुखड़े पे,
तो छुप जाता है सूरज,
जाने-जाके किन गलियों में.
जब चलती हूँ उठा के,
घूँघट मैं अपने मुखड़े से ,
तो चाँद भी बहक जाता है,
मेरे यौवन के रस से.
कैसी जवानी,
रब्बा तुने है दी मेरे तन पे,
हर गली में एक आशिक हैं मेरा,
हर घर में है एक सौतन रे.
कैसे छोड़ दूँ मैं,
साजन को अकेले होली में,
कितनो कि नजर मुझपे है,
और कितनो कि मेरे घर पे, परमीत

होलिका-दहन


रंगे-मोहब्बत चमक उठती है,
आज भी,
उनके एक नज़र मिलाने से,
दर्दे-जिगर को,
क्या समझाउं परमित,
जो आज भी बहल जाता है,
उनके सिर्फ मुस्कराने से.
वो खेल जाती हैं होली,
आज भी,
मेरी तमन्नावों से,
एक कसक सी उठती है,
जब फरेबे-मोहब्बत की,
जो उनके सिने में.
की जाने कब तक लुटता रहेगा,
यूँ ही मेरा आसियाना,
हर साल आ जातीं है वो,
होलिका-दहन मानाने,
मेरे ही आँगन में.

प्रथम-मिलन II


ढल जाने दीजिये,
ढल जाने दीजिये,
आँचल को मेरे,
ढल जाने दीजिये।
कब तक मैं सम्भालूँ,
ये शर्मो-हया,
आज, अभी, इसे,
यहाँ टूट जाने दीजिये।
सीने में दबा के,
आँचल में छुपा के,
रखा है बरसों से,
जिसे राहों में बचा के,
आज, अभी, उसे,
यहाँ लूट जाने दीजिये।
ढल जाने दीजिये,
ढल जाने दीजिये,
आँचल को मेरे,
ढल जाने दीजिये।
कब तक मैं ही रहूँ,
बंध के रिवाजों से,
अरमानों को अपने,
यूँ दफना के,
जल रही है दिया,
जो कई रातों से,
आज, अभी, उसे,
यहाँ बुझ जाने दीजिये।
ढल जाने दीजिये,
ढल जाने दीजिये,
आँचल को मेरे,
ढल जाने दीजिये, परमीत।

गुमराह


अंदाज बदल-बदल के रखते है,
वो आँचल को अपने सीने पे,
कहीं गुमराह न हो जाए कोई,
देख के रंग उनके योवन के.
निकलते है बदल-बदल के,
वो राहें अपने घर से,
कहीं बवाल न हो जाए, देख के
उनका मुखड़ा इस शहर में, परमीत

कक्षा बारह की मोहब्बत


वो अपनी मोहब्बत का,
अंदाज़ ही वैसा था,
वो रुक-रुक कर चलती थीं,
मैं चल-चल के रुकता था।
वो किताबों कि दुकानों पे,
उनका पन्नों कों पलटना,
औटो में बैठे-बैठे,
उनका उतर जाना।
वो अपनी मोहब्बत का,
अंदाज़ ही वैसा था,
वो रुक-रुक कर देखती थीं,
मैं देख-देख के रुकता था।
कभी बैठ न सके हम,
संग में नीचे किसी डाल के,
ना छू ही सके हम,
संग में हवावों के झोंकें।
वो अपनी मोहब्बत का,
अंदाज़ ही वैसा था,
वो लिखती थीं अपने पेज पे,
मेरी कलम को ले के,
मैं उनकी कलम से,
अपनी किताबों को भरता था।
जाने कहाँ होंगी,
वो किसकी बाँहों में,
पर दिल ये धड़कता है,
उनकी ही यादों में।
वो अपनी मोहब्बत का,
अंदाज़ ही वैसा था,
वो रोटी भी दांतों से,
काटती थी मुझे देख के,
पीने के ही बहाने, नल पे
छींटे मैं उनपे उड़ाता था।
न लौट के ही आएगी,
वो मेरी जिंदगी,
पीएचडी तक हो गयी,परमीत
न कोई वैसी ही फिर मिली।