बुढऊ


सर में ना एको बाल,
ना आँख में बा जोति।
फिर भी बुढऊ ढुढ़े लें,
कोई एगो, पकावे ल रोटी।

परमीत सिंह धुरंधर

मुह-दिखाई


ऐसे नाहीं,
वैसे नाहीं,
ए राजा जी.
पाहिले कुछु त,
चढ़ाई हमपे,
ए राजा जी.
ए ने नाहीं,
वो ने नाहीं,
ए राजा जी.
पाहिले कुछु त,
दिखाई हमके,
ए राजा जी.
मत कुछ सिखाई,
ना बाताई,
ए राजा जी.
पाहिले रखीं,
एहिजा मुहवा-दिखाई,
ए राजा जी.

परमीत सिंह धुरंधर 

सैया हिमालय में चलके


जमाने की ये भीड़ सैया, ना भाये हमके।
चलअ बनावअ कुटिया, हिमालय में चलके।
छोड़ के अइनी हम माई के अंगना,
की बाँध के रखे तोहके अपना आंचरा।
की घरवा के ई खटपट सैया, ना भाये हमके।
चलअ बनावअ कुटिया, हिमालय में चलके।
की देहिया दुखाये ल, रात-दिन करके,
एगो तू रहतअ तअ ना कहती ई बढ़के।
पर सब केहूँ के कचर-कचर सैया, ना भाये हमके।
चलअ बनावअ कुटिया, हिमालय में चलके।

परमीत सिंह धुरंधर 

नगरिया चलल बा ये भोला


नगरिया चलल बा ये भोला,
डगरिया उठल बा ये भोला,
तहरे ही धाम अब ई रुकी,
भक्तन के टोला ये बाबा.
केहू के तन्वा में पीड़ा उठल बा,
केहू के मनवा में आंधी मचल बा,
सबके दिल के आस बा ,
तहरे दुअरिया पे बाबा .
अन्ख्वा के लोर त सुख गईल बा,
मनवा त अभी बैचेन बा,
कब तक आँचल ई एसे रही, सुखल आ खाली ये बाबा,
भर दिहिन अब त भक्तन के झोला ये बाबा.
आ व ना मान जा अब, पूरा कर अ परमित के कामना,
ताहरा से बढ़ के कें बाटे ये संसारिया में बाबा.
कभी-कभी त उठेला मनवा में हाम्रो आस हाँ,
तहरे से जुरल बा भक्तन के सारा ख्वाब हाँ,
अब त सुन के पुकार आँखवा त खोलीं ये बाबा,
ल देख अ आइल्बानी तहरे वोसरिया ये बाबा.
डगरिया भरल बा ये भोला,
नजरिया लागल बा ये भोला.
नगरिया……………..ये बाबा.

परमीत सिंह धुरंधर

सैया उहे खत्री


ए सखी हमरा ता चाहीं सैया हलवाई हो,
हर दिन छानी जलेबी, और हमके खिलाई हो.
ए सखी हमरा ता चाहीं पियवा अनाड़ी हो,
अपने ठिठुरी आ हमके ओढ़ाई रजाई हो.
ए सखी हमरा ता चाहीं बालम पनवारी हो,
बात – बात पे जे धरी हमके अक्वारी हो.
ए सखी हमरा ता चाहीं सजना बिहारी हो,
अरे बिहारी चाही तहरा, काहे हो.
ए सखी हमरा ता चाहीं सजना बिहारी हो,
लाखों में एक होलन रसिया बिहारी हो.
ए सखी हमरा चाहीं सैया उहे खत्री हो,
धुप हो – छाव हो, हर पल लगावे जो छतरी हो.

परमीत सिंह धुरंधर

रतिया में सैया


रतिया में अइलन सैया देवर नियर,
हम कइनी हुकूमत, उ सजा कटलन।
रतिया में अइलन सैया सास नियर,
हम कइनी जुलुम, उ चूल्हा – चाकी कइलन।
रतिया में अइलन सैया ससुर नियर,
हम सुनइनी दस गो बतिया, उ चुप-चाप सुनलन।
रतिया में अइलन सैया बलमा नियर,
हम सुतनी तान के, उ अगोरत बइठलन।

परमीत सिंह धुरंधर

सुग्गा


सुग्गा पकरले बानी एगो बगइचा में,
आ व अ न सखी, तोहके दिखाईं,
बोलेला मिठू कइसन हमरा कहला में.
एके नजर डालनी त अ भूल गइल,
पंख पसारल, की छोड़ के अब आपन,
घर- द्वार बइठल बा हमरा आसरा में.
आवअ न सखी, तोहके दिखाईं, बोलेला
मिठू धुरंधर कइसन हमरा कहला में.

जवानी के लिल्ला


देख अ जवानी के लिल्ला,
एगो मुस्की पे,
हिलअइले बारी जिल्ला।
चलावअ तारी हसुआ घांस पर,
लेकिन,
चिरअ तारी हमार सीना।
देखअ जवानी के लिल्ला,
हिलअइले बारी जिल्ला।
बैला मारखाव भी आके,
इन्कारा आगे,
हो जाला एकदम सीधा।
देखअ जवानी के लिल्ला,
हिलअइले बारी जिल्ला।
अंखिया में कजरा डाल के,
चुनर के अपना छान के,
लीलअ तारी बीघा – पे – बीघा।
देखअ जवानी के लिल्ला,
हिलअइले बारी,
धुरंधर सिंह के जिल्ला।

नयका धान


जब से जवान भइल बारु,
नयका तू धान भइल बारु।
चमकअ तारु, उछलअ तारु,
चवरा से लेके खलिहान तक.
लूटअ तारु, धुनअ तारु,
गेंहूँ से लेके कपाश तक.
सारा जवार ई दहकता तहरे,
जोवन के ई लहक से.
बुढऊ के मन भी बहकता,
तहरे आँचल के उफान पे.
खेलअ तारु, खेळावअ तारु,
आँचरा में सबके बाँध के.
रगरअ तारु, झगड़अ तारु,
चढ़ के सबके दूकान पे.
जब से जवान भइल बारु,
धुरंधर सिंह के धान भइल बारु।

दुखिया


तानी सुनी न दिलवा के बतिया,
कोरा-कोरा मन बा, कोरा रे रतिया।
ए भोला तानी सुनी ना,
का कह अ तारी दुखिया।
गावें-गावें खेलनी,
सावन के झूला भी,
सब सखियाँ के गोद भरल,
बस रह गैनी हम ही,
कोरा-कोरा हमर आचार, कोरा रे देहिया।
तानी सुनी न दिलवा के बतिया,
कोरा-कोरा मन बा, कोर रे रतिया।
ए भोला तानी सुनी ना,
का कह अ तारी दुखिया।