शिव विष धारण कर गए


जिंदगी को जीने का
अपना – अपना विचार है.
जब बंट रहा था अमृत
तो शिव विष धारण कर गए.
सोने की लंका का त्याग कर
कैलास को पावन कर गए.
भगीरथ के एक पुकार पर
प्रबल-प्रचंड गंगा को
मस्तक पर शिरोधार्य कर गए.
जब बंट रहा था अमृत
तो शिव विष धारण कर गए.

गर्व का त्याग कर
कृष्णा सारथि बने कुरुक्षेत्र में.
सब सुखों का श्रीराम
परित्याग कर गए.
हिन्द की इसी धरती पे
जब रचा गया चक्रव्यूह
तो वीरता के अम्बर को
अभिमन्यु दिव्यमान कर गए.
जब बंट रहा था अमृत
तो शिव विष धारण कर गए.

परमीत सिंह धुरंधर

तेरी खतों के सहारे


हम भी जवानी में जिगर रखते थे
अब बस तेरी यादें हैं, तेरी खतों के सहारे।
कभी हौसला हमारा भी था तूफानों से टकराने का
अब सीने में तूफ़ान रखते हैं, तेरी यादों के सहारे।

परमीत सिंह धुरंधर

समंदर


समंदर भी कहाँ शांत है हवाओं का जोर से?
तन्हा – तन्हा सा मैं तन्हाइयों का शोर में.
जो समझते हैं मसीहा खुद को इस दौर है
उन्हें क्या पता, कब क्या हो जाए, किसी मोड़ पे?

परमीत सिंह धुरंधर

कौन है ?


कौन हमारी नींदों में विरहा के ये धुन बजाता?
कौन है जो मेरे रक्त का, यूँ निरंतर ताप बढ़ाता?

कौन है जो मिलन के ये आस जगा के छुप रहा?
कौन है जो मुझको जगा के यूँ, स्वयं सो रहा?

कौन है जो नैनों के बाण से ह्रदय मेरा बेंध रहा?
कौन है जो मेहँदी की लाली से ख़्वाबों को सींच रहा?

कौन है जो मुझको बेशर्म बना के स्वयं शर्म में बांध रहा?
कौन है जो प्रेम पग बढ़ा के मुझको यूँ छल रहा?

 

परमीत सिंह धुरंधर

जो अनंत, असीमित हो


जो अनंत, असीमित हो
जो निरंतर प्रवाहित हो.
जो दुःख में, सुख में
अकल्पनीय, अकल्पित हो.
जो मधुर से मधुरतम
प्रेम में प्रीत हो.

जो जड़ से जड़ित,
प्रेम से पीड़ित हो.
जो प्रेयसी के बाहों में भी
विरह से ग्रसित हो.
जो प्रेम के मिलन को
निरंतर अंकुरित हो.

जिसके नाम पे दुनिया
भय से कम्पित हो.
जो उषा में, निशा में,
हर एक दिशा में,
सूर्य सा अबिलम्ब उदित हो.

 

परमीत सिंह धुरंधर

निगाहों से मोहब्बत, वो बचपन में था


अब शौक है अधरों का मुझको
निगाहों से मोहब्बत, वो बचपन में था.
तुम भी सम्भालों अपना दुप्पटा जरा
इन्हे उड़ाने का शौक तो हवाओं को था.

क्यों बोझिल हो जाती हैं?
शर्म से पलके पलभर में.
जिन्हें जमाने से लड़ाने का शौक तुमको था.
और अब तक बैठा है कुंवारा Crassa
वफाए – मोहब्बत, तुमसे जमाने को था.

 

परमीत सिंह धुरंधर

मेरे बाहर कुछ भी नहीं


मैंने प्यार में क्या – क्या गवाया?
इसकी कोई गिनती नहीं।
सब मेरे अंदर है,
मेरे बाहर कुछ भी नहीं।

समेट लूँ, समेट लूँ, समेट लूँ
दुनिया की हर ख़ुशी
हर कोई यही चाहता है आज.
मेरी ख़ुशी क्या है?
मैंने आज तक समझा ही नहीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

जिंदगी की पूरी जरूरतें नहीं होती


हर किसी की मोहब्बत में ख्वाइशें नहीं होती
बिस्तर तो होती है पर सिलवटे नहीं होती।

क्या संभाले कोई जिंदगी को ?
सँभालने से जिंदगी की पूरी जरूरतें नहीं होती।

शिकायतें बढ़ती जा रही हैं उसकी
हर रात जिंदगी के साथ.

अब चाँद कहने और चुम्बनों से
दूर उनकी शिकायतें नहीं होती।

 

परमीत सिंह धुरंधर

आवो जमाने को बिगाड़ के देखें


सोचता हूँ की उनसे रिश्ता सुधार के देखें
किसी मोड़ पे फिर से उन्हें पुकार के देखें।
और एक छोटी सी इल्तिजा है दोस्तों
की आवो फिर से बैठें एक साथ
और जमाने को बिगाड़ के देखें।

वो गुजरे सामने से अपने
और उनको हम छेड़ के देखें।
वो अपनी आँखों में त्रिस्कार भर के
फिर हमें नफ़रत भरी नजरों से देखें।
और एक छोटी सी इल्तिजा है दोस्तों
की आवो फिर से बैठें एक साथ
और जमाने को बिगाड़ के देखें।

 

परमीत सिंह धुरंधर

Statue of Unity


दुकानों में दवाओं की कमी हो गयी है
इस कदर रिश्ते टूट और बन रहें हैं
की दुकानों में सही में
गर्भनिरोधक दवाओं की कमी हो गयी है.
और तुम बना रहे हो Statue of Unity
जहाँ देह, बिस्तर और बिस्तर आँगन बदल रही है.

अगर बनाना ही है Statue
तो अहिंसा का बनाओ, पंचशील का बनाओ।
अरे कुछ नहीं तो कम – से – कम
आरक्षण का बनाओ।
जिसने आज ७० साल में इतना unite कर दिया
की देखो आज हर जाति आरक्षण मांग रही है.
दुकानों में दवाओं की कमी हो गयी है.

और Statue of Unity तो तमाचा है
हमारे गालों पे
भला हम कब unite थे.
तभी तो हमें मुगलों ने लूटा ,
तुर्को, अफगानों और अंग्रेजों ने लूटा।
और आज ७० सालों से अपनी सरकार
लूट रही है.
दुकानों में दवाओं की कमी हो गयी है.

 

परमीत सिंह धुरंधर