बेचैन सी जिंदगी Crassa की


बेचैन सी जिंदगी Crassa की
चैन की कोई उम्मीद नहीं।
बंध चुका हूँ चारो ओर से ऐसे
की इस चक्रव्यूह का कोई अंत नहीं।

किसे पुकारू, किसकी और देखूं?
किसी दिशा का ध्यान नहीं
किसी क्षण विश्राम नहीं।
आराध्या मेरे कैलाश पे
पर मैं भगीरथ नहीं।
राम तो मेरे अंदर हैं
पर मैं भक्त हनुमान नहीं।

अतः परमार्थ होगा पिता के नाम पे
अभिमन्यु को परिणाम की चिंता नहीं।
यूँ बाँध दूंगा काल को समर में
की पिता के मनो-मस्तिक पे
फिर कोई भार नहीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

कहार थे बड़े – बड़े उस्ताद रे


दही पर के छाली छील के
बोले रे सैयां ढील के.
मैं हूँ खिलाड़ी, पक्का बिहारी
चराता हूँ भैंस, बैठ भैंस की पीठ पे.

उठा के घूँघट चट सखी
सवार हो गयी छाती पे.
पिसती हूँ मन भर गेंहूँ मेरे राजा
जांत पे एक ही हाथ से.
दही पर के छाली छील के
खिलाती थी माँ सीधे खाट पे.

छोड़ो रानी मायके की कहानी
अब आ गयी हो मेरे गांव में.
यहाँ का मुसल, यहाँ का जांता
भारी पड़े हर पहलवान पे.
सुनो राजा, मैं हूँ कुवारी छपरा से
चढ़ी डोली,
जिसके कहार थे बड़े – बड़े उस्ताद रे.

 

परमीत सिंह धुरंधर

ऐसी उतरी है जवानी उनपे


मोहब्बत में होती है बगावत नहीं
बगावत में होती है मोहब्बत नहीं।

ये वो फितरत है इंसानों की दोस्तों
जानवरों में ऐसी कोई चाहत नहीं।

ऐसी उतरी है जवानी उनपे
की किसी के दिल को राहत नहीं।

कैसे संभाले खुद को Crassa
की धड़कनों पे होती सियासत नहीं।

मुझे पता है वो मेरी नहीं होंगी
अपनी जेब में वो दौलत नहीं।

जी लेंगें यूँ ही उनकी यादों में
ह्रदय में अपने कोई और विरासत नहीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

वो अपना पता दे गयीं


वो उम्र भर की दुआ दे गयीं
नजर मिली तो दवा दे गयीं.

ये शहर ही ऐसा है
की हर कोई अकेला है.

वो किताबों में छुपाकर
अपना पता दे गयीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

चिठ्ठी मेरी


कातिल बड़ी है नजर ये तेरी
प्यासे हैं सब देख जवानी तेरी।
कभी किताबों में कुछ तो हाँ लिख दे
अगर पढ़ नहीं सकती चिठ्ठी मेरी।

 

परमीत सिंह धुरंधर

बेआबरू


जो हमें हमारी आरजू दे गए
कसम से बड़े बेआबरू कर गए.

 

परमीत सिंह धुरंधर

खुदा कहाँ है?


सब चाहते हैं जानना की खुदा कहाँ है?
जन्नत कहाँ है?
माँ जिधर कदम रख दे
उससे हसीन भला और क्या है?

 

परमीत सिंह धुरंधर

पतली कमर का सिहरना हुआ – 2


शर्म – लज्जा वस् मैं तट पे ही रही
उसका निर्वस्त्र – मग्न
लहरों से खेलना, लहरों में तैरना हुआ.

 

परमीत सिंह धुरंधर

चुपके से पायजेब पहना दूँगा


दरिया में आगा लगा दूँगा
दर्पण में ख्वाब जगा दूँगा
ऐसी बाजीगरी के हुनर
रखता हूँ इन हाथों में
तू बस घूँघट तो उठा
मैं शर्म – हया सब चुरा लूँगा।

तितलियाँ चतुर हैं, चंचल हैं
उड़ जाती हैं दो पल बैठ के
मगर दो पल तो बैठे मेरे पास
चुपके से पावों में
पायजेब पहना दूँगा।

रहस्य से भरे हैं लोग यहाँ
एक मैं ही दिल का खुला हूँ
तू एक पल को तो
दिल लगा के देख
मैं सारी उम्र उसी पल में
गुजार दूँगा।

शहर भर से मत पूछा कर
मेरे अतीत के किस्से
तू श्री गणेशाय: तो कर
मैं धीरे – धीरे तुझे
सब सुना दूँगा।

 

परमीत सिंह धुरंधर

 

 

गरीबी में भी गुरुर रखती हैं


वो अपनी बाहों में समंदर रखती हैं.
तभी तो इस गरीबी में भी गुरुर रखती हैं.

ना जिस्म पे सोने – चांदी के गहने
ना लाखों – हजारों का श्रृंगार ना कपड़े
मगर राजा, रंक सभी नज़ारे गराये हैं उसपे
जाने क्या?
मैंले – कुचले, फटे – चिथड़े
अपने दुप्पटे में वो रखती है.

 

परमीत सिंह धुरंधर