सैया माँगता दाल पे आचार हो
छोड़ के घी, दही सजाव हो.
का से कहीं दिल के बात सखी,
छोड़ के आपन लोक-लाज हो.
परमीत सिंह धुरंधर
सैया माँगता दाल पे आचार हो
छोड़ के घी, दही सजाव हो.
का से कहीं दिल के बात सखी,
छोड़ के आपन लोक-लाज हो.
परमीत सिंह धुरंधर
कहीं सीने में दिल है,
कहीं दिल पे सीना,
बड़ा कातिल है गोरी,
तेरे वक्षों पे पसीना।
कहीं जीने में मुश्किल है,
कहीं मुश्किल है जीना,
बड़ा कातिल है गोरी,
तेरे वक्षों पे पसीना।
कभी मन का सकुचाना,
कभी मन का बहकना,
बड़ा कातिल है गोरी,
तेरे वक्षों पे पसीना।
ये मंजर वही है,
जिसके पीछे है जमाना,
बड़ा कातिल है गोरी,
तेरे वक्षों पे पसीना।
ना बाँध चोली कसके ऐसे,
मुश्किल हो जाता है,
धड़कनो को रोकना।
बड़ा कातिल है गोरी,
तेरे वक्षों पे पसीना।
परमीत सिंह धुरंधर
रिश्तों में रफ़्तार, किस्तों में व्यापार,
बहुमत पा कर भी मेघालय में,
नहीं बनी कांग्रेस की सरकार।
जोगी रा सा रा रा.
बाप ने बेटे को करा दी जेल,
राजनीति के ऐसे – ऐसे दावँ – पेंच।
जोगी रा सा रा रा.
परमीत सिंह धुरंधर
गुजरे वक्त में सब कुछ मिट गया,
तू निखरती जा रही, मैं तड़पता जा रहा.
आँखों में डूबकर भी किनारा ना मिला,
तू उस तरफ रही, मैं इस तरफ रहा.
मोहब्बत में ये दूरी ही दर्दे-कयामत है ज्वाला,
Gutta, Crassa की ना हुई,
Crassa, Gutta का ना हुआ.
परमीत सिंह धुरंधर
काली उसकी अँखियों में रस है भर रहा,
मैं पीने गया तो उसने आँखे मूँद ली.
उसके अधरों पे अमृत है बसा,
मैं पीने गया तो उसने घूँघट घींच ली.
परमीत सिंह धुरंधर
तू 24 की ओय क्या बात है
40 में भी मुझमे वो ही उबाल है.
परमीत सिंह धुरंधर
16 साल की गुड़ी, नीले सलवार में,
ले गयी दिल मेरा हाय, डाल अँखियों को आँख में,
मैं पूछता ही रहा पता, वो गयी हंस के टाल रे.
पतली कमर पे दो जोबन को उछाल के,
ले गयी दिल मेरा हाय, डाल अँखियों को आँख में,
मैं पूछता ही रहा पता, वो गयी हंस के टाल रे.
नाजुक बदन पे नखरे हजार के,
अँखियों से निकले बस तीखे ही बाण रे,
ले गयी दिल मेरा हाय, डाल अँखियों को आँख में,
मैं पूछता ही रहा पता, वो गयी हंस के टाल रे.
काँटों से कटीली पूरी रास की खान रे,
ले गयी दिल मेरा हाय, डाल अँखियों को आँख में,
मैं पूछता ही रहा पता, वो गयी हंस के टाल रे.
परमीत सिंह धुरंधर
ना गुरु गोबिंद जी होते,
तो ना झेलम में पानी होता,
ना ये धरती होती,
जिसपे गाँधी का नाम होता।
ऐसी सरहदें घींच गए,
वो अपनी तलवारों के बल पे,
की कोई भी,
अहिंसा में बल दिखा गया.
जिसने चुनवा दिया,
अपने दो – दो पुत्रों को दीवारों में,
उससे भी बड़ी त्याग की परिभाषा क्या?
ऐसी सरहदें घींच गए,
वो अपनी तलवारों के बल पे,
की कोई भी,
कपड़ों का त्याग कर महान बन गया.
परमीत सिंह धुरंधर
नवम्बर का महीना था,
दिसंबर का इंतज़ार था,
वो बोलीं,
जनवरी में मेरी हो जायेंगीं।
एक चिठ्ठी पहुँची,
फरवरी में घर मेरे,
की 14 को,
वो किसी और की हो जायेंगीं।
परमीत सिंह धुरंधर
किताबे खुली रखो,
दिल को बाँध के रखो,
वो अभी – अभी जवान हुई हैं,
उनसे बस रातों का रिस्ता रखो.
वो जितना चाहें,
गीत गाती रहें वफ़ा के.
तुम उनसे अभी,
ना इसकी उम्मीदें रखो.
परमीत सिंह धुरंधर