बूढ़े भी जवान है


ये इश्क़ का रंग है जो बूढ़े भी जवान है
तू चले लहरा के तो झूमता आसमान है.
और कौन है आस – पास जो कोई ख्वाब ले
एक तेरे चोली के रंग पे लूट रहा मेरा बिहार है.

जुल्मी के पाइयाँ, जुल्मी के पाइयाँ परे नई रतिया सारी
रात भर खेले पिया, ह छपरा के खिलाडी।
मारेला गरहिया में मछली जाल डाली
रात भर खेले पिया, ह छपरा के खिलाडी।
धीमी -धीमी आँच पे डभकाये रतिया सारी
रात भर खेले पिया, ह छपरा के खिलाडी।

तहरा प्यार में भइल बानी बेकार राजा जी,
हमरा चोलिया के खोल दी आज रात राजा जी.
तन्वा ना मनवा में भी ताप बढ़ता,
जाइ कौना वैधा के पास राजा जी.

का देख के बाबुल हमर चुन देहलन बिहारी
ना कउनो सुहुर बाते ना रहल जिमींदारी।
ऐसे मत कहा बबुनी खून के ह खाटी
रामाश्रय सिंह के पोता ह, चंद्रदेव सिंह के नाती।
ना छोड़ी साथ तहर, चाहे रहल ना जमींदारी।

जिसे तेरी अधरों की चाहत, वो जमाना होगा
जिसे तेरी आँखों की चाहत, वो ग़ालिब का फ़साना होगा।
हम बिहारी हैं, या मिट जाएंगे या तेरी वक्षों पे हमारा आसियाना होगा।
हम बिहारी हैं, हमारे आगे तख्तो-ताज भी कुछ नहीं
हमसे टकराने से पहले खुदा के माथे पे भी पसीना होगा।

दर्द नहीं दिल की दवा दे
बाहों में ना सही, दूर से देख के मुस्करा दे
अब भी मेरी किताबों में तेरी ही तस्वीर है
मुझे न सही, उसे अपने सीने से लगा ले.
दिन भी किसी और का, रात भी किसी और की
ये चूड़ी, कंगन, मेहँदी, और बच्चे भी किसी और के
ये जालिम कम -से-कम, एक टैटू तो मेरे नाम का बनवा ले.

तेरी आँखों का एक रंग मुझे बड़ा मीठा सा लगे
जब तू अपने बाबुल के पीछे छिप के मुस्कराने हाँ लगे.

ख़्वाबों से हकीकत में -२, जो तुम उतर जावों
दास्ताने मोहब्बत में फिर तन्हाई न होगी।
एक घडी ही सही तुम जरा पास आके बैठों
बिहार में हमारे फिर गरीबी ना होगी।

मेरी जान इशारा कर दे तू अपनी इन नजरों से
सब कुछ चढ़ा दूंगा मैं तेरे चढ़ते जोबन पे
तू भी हैं लाखों में लिए हाँ ादाएँ
और मैं भी आगे हूँ अपना सबकुछ लुटाने में.

मुझे तुम्हारी इन आँखों से कोई तो एक ख्वाब मिले
फिर ना मिले ये जहाँ, पर एक जाम तो मिले।
बंध चुके हैं सभी इसमें, किसी एक को तो आसमाँ मिले।
खुदा लिखना कभी वो किस्मत जिसमे कोई लड़की परेशान मिले।
बस एक टुटा ही नहीं हूँ मैं, बाकी सारे अरमान मिटे।
एक हम ही तड़पते रहे इस जहाँ में, बाकी सब हुनरमंद -होशियार मिले।

आज आये हो तो कल का बहाना ना दो,
चांदनी रात को यूँ सुनी जाने ना दो.
मेरी आँखे सदा देखती हैं ख्वाब तेरा
इन आँखों से ये ख्वाब मिटने ना दो.
पहले से ही टूटा हूँ और कितना तोड़ोगे
ठुकराने से पहले इतना बता भी तो दो.
हमें दर्द की आदात हो गयी हैं
एक दवा छोड़ के तुम कुछ भी पिला दो.

मेरी कलम ने लिखा है तेरी कमर पे तिल है
तू झुठला दे, पर ये ही सच है, की वही मेरा दिल है.

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तिल


मैं प्यासा हूँ
मेरी प्यास मिटाने को मिल.
खूबसूरत अंग लिए हो तुम
इन अंगों पे मेरे रंग चढ़ा के मिल.
मैं गिनता रहूं रात भर तेरे जिस्म के तिल को
तू एक रात तो दिया बुझा के मिल.

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माँ की निगाहों में है


फ़िज़ाओं में रौशनी सितारों से नहीं, दुआओं से है
मेरी राहें-मंजिल मेरी माँ की निगाहों में है.

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जख्म


दरिया और समंदर में, समंदर गहरा है
तेरे हिज़्र का जख्म, हर जख्म से गहरा है.
जझुकि तेरी नजर, तेरे शर्म का पर्दा है
पर इनसे चलें तीरों का जख्म बहुत गहरा है.

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मुसाफिर हैं जो तन्हाई के उनका शौक भी तन्हाई है
जो छू के बैठें हैं तुझे, उनकी चाह में नहीं अब कोई अंगराई है.

जिस्म की ख्वाइसे दिल की ख्वाइशों से जुदा है क्या
ये जिसे तुम कह रहे हो मोहब्बत, वासना से जुदा ही क्या?

मेरी जिंदगी ही क्या जिसमे तेरा कोई जिक्र नहीं
वसल न सही, ना सही, तुझसे कोई हिज्र नहीं।

वो आँखों से इज़ाज़त लेने का दौर कहाँ
जब हम निगाहों से रोटी बदल लेते थे
वो मोहब्बत का दौर कहाँ
जहाँ बिना वसल के रात गुज्जार लेते थे.

ना पूछ की कैसे गुजरी है रात
ये पूछ की कैसे गुजारी है रात.
वो जो कहते थे हंस -हंस के हर बात
अब बिना कहे काट लेते हैं कई-कई रात.

साकी तेरा मुस्कराना गेम इलाज़ है मेरा
ये बस शराब नहीं दवा- ए -फ़िराक है मेरा।

सुकून मिला न मुझको शबे-वसल के बाद
कुछ ऐसे टूटा हूँ मैं तुम्हारे हिज़्र के बाद.

मोहब्बत में ताक्काबुर उनका अंदाज है
इश्क़ की मानिल कुछ नहीं बस गेम-फ़िराक़ है.

मंजिल तक आते -आते हर कारवां छूट गया
हर किसी के नसीब में कहाँ ये मुकाम है.

साकी पिला कुछ ऐसे की मयकदा घर बन जाए
वसल तो मुमकिन नहीं जख़्म भर जाए
कई रातों से आँखों को नींद मय्यसर नहीं
तू बस मुस्करा दे की कोई ख्वाब मिल जाए.

खुदा जानता है काफिर वो नहीं जिसने छोड़ दी इबादत तेरे हिज़्र के बाद
काफिर वो है जो मांगता है जन्नत और उसकी ७२ हूरें तुझसे वसल के बाद.

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तन्हाई


हिज्र में तुम्हारे रहा न मुझ सा कोई
जो वो समझे मेरी ये तन्हाई।

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मोहब्बत मेरी एक इबादात है


एक तू ही नहीं है और भी हैं यहाँ
इनके लिए सज-संवर के है धरा.
दिल तोड़ो ना कभी किसी का
हर दिल में बैठा है खुदा यहाँ।
मोहब्बत मेरी एक इबादात है
ना मानते हैं वो, ना ही माने खुदा।

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राहगीर


उनकी जुल्फ के कई हैं राहगीर यहाँ
पर कोई बसा न पाया अपनी जागीर यहाँ।
ग़ालिब-से-मीर तक, सबकी रही एक ही तकदीर यहाँ
कोई बंधा जंजीर से, कोई बनके रहा बजीर यहाँ।
वो तो सेज से, सेज पे ही रही यहाँ
मैं बैठा रहा ताउम्र लिए एक तस्वीर यहाँ।

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चूड़ियाँ


मैंने उन आँखों में बस शर्म को ही देखा
खेलता उस शर्म से कोई और है.
खरीदता ही रह गया मैं चूड़ियाँ
पहनाता उसे और तोड़ता कोई और हैं.
और कैसे मांगू रब बता, जिसे मांगता हूँ तुझसे
तेरे ही दर पे उसे अपनाता कोई और है.

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जवानी


आग लगा दो पर्वत में अगर छाई तुमपे जवानी है
ना मिली उनकी जुल्फ तो क्या, अपनी भी एक कहानी है.
टुटो, टुटो तुम बार बार ऐसे, की चोट हर बार तुम्ही पे हो
अधरों पे वो प्यास बसा लो, जहाँ हर दरिया सूख जानी है.

The image was taken from google search from the link https://www.mcgill.ca/newsroom/channels/news/mountain-fires-burning-higher-unprecedented-rates-331540

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