महान पिता का पुत्र कभी खोटा नहीं होता,
IRS/IAS होने से कोई ऊँचा नहीं होता।
कर्म ही किसी का उस गर्त तक ले जाता है,
जहाँ फैसला उसके शक्लों – सूरत पे नहीं होता।
परमीत सिंह धुरंधर
महान पिता का पुत्र कभी खोटा नहीं होता,
IRS/IAS होने से कोई ऊँचा नहीं होता।
कर्म ही किसी का उस गर्त तक ले जाता है,
जहाँ फैसला उसके शक्लों – सूरत पे नहीं होता।
परमीत सिंह धुरंधर
मत पूछ मेरे दिल से समुन्दर का पता,
वो बहता है इसी के हौसलों से यहाँ।
कब तक इंसान बैठेगा खुदा के भरोसे,
कभी -न – कभी हाथों में हल उठाना होगा।
अगर माँ बैठ जाएँ की खुदा पाल देगा बच्चो को,
तो ए मंदिरों, खुदा का नामों-निशान नहीं होगा।
वो बांटते हैं घूम-घूमकर चिट्ठी अपने माफ़ी की,
ये बता रहा है की उनकी औलादों का हुनर क्या होगा।
परमीत सिंह धुरंधर
चाहे कंगन हो या कमंडल हो,
राजपूतों के साथ दंगल और मंगल हो.
परमीत सिंह धुरंधर
चाहे दंगल हो या मंगल हो,
राजपूतों के साथ बस कमंडल हो.
परमीत सिंह धुरंधर
सैया माँगता दाल पे आचार
घी, दही सजाव छोड़ के.
का से कहीं दिल के बात सखी
आपन लोक-लाज – शर्म छोड़ के.
सांझे के सेजिया पे पसर जालन
कतनो बैठीं श्रृंगार करके।
सैयां निकलल बाटे नादान
का से कहीं, लोक-लाज – शर्म छोड़ के.
तनको ना छुए मिष्ठान
चाहे रख दी चोली खोलके।
तूड़ देहलन सारा दिल के अरमान
का से कहीं, लोक-लाज – शर्म छोड़ के.
परमीत सिंह धुरंधर
मुझे तुमसे मोहब्बत का
हर साल इरादा है.
मेरी चोली कह रही है
तू इसका धागा है.
खुद ही सिलूँगी
खुद ही टाकुंगी।
तुझे सबसे छुपा के रखने का
ये ही अच्छा बहाना है.
मेरे अंग-अंग से खेल
तू भ्रमर सा गुनगुना के.
मेरा यौवन कह रहा है
तू इसका नशा है.
परमीत सिंह धुरंधर
सैया माँगता दाल पे आचार हो
छोड़ के घी, दही सजाव हो.
का से कहीं दिल के बात सखी,
छोड़ के आपन लोक-लाज हो.
परमीत सिंह धुरंधर
कहीं सीने में दिल है,
कहीं दिल पे सीना,
बड़ा कातिल है गोरी,
तेरे वक्षों पे पसीना।
कहीं जीने में मुश्किल है,
कहीं मुश्किल है जीना,
बड़ा कातिल है गोरी,
तेरे वक्षों पे पसीना।
कभी मन का सकुचाना,
कभी मन का बहकना,
बड़ा कातिल है गोरी,
तेरे वक्षों पे पसीना।
ये मंजर वही है,
जिसके पीछे है जमाना,
बड़ा कातिल है गोरी,
तेरे वक्षों पे पसीना।
ना बाँध चोली कसके ऐसे,
मुश्किल हो जाता है,
धड़कनो को रोकना।
बड़ा कातिल है गोरी,
तेरे वक्षों पे पसीना।
परमीत सिंह धुरंधर
रिश्तों में रफ़्तार, किस्तों में व्यापार,
बहुमत पा कर भी मेघालय में,
नहीं बनी कांग्रेस की सरकार।
जोगी रा सा रा रा.
बाप ने बेटे को करा दी जेल,
राजनीति के ऐसे – ऐसे दावँ – पेंच।
जोगी रा सा रा रा.
परमीत सिंह धुरंधर
गुजरे वक्त में सब कुछ मिट गया,
तू निखरती जा रही, मैं तड़पता जा रहा.
आँखों में डूबकर भी किनारा ना मिला,
तू उस तरफ रही, मैं इस तरफ रहा.
मोहब्बत में ये दूरी ही दर्दे-कयामत है ज्वाला,
Gutta, Crassa की ना हुई,
Crassa, Gutta का ना हुआ.
परमीत सिंह धुरंधर