सेना की नौकरी


मैं तुम्हारे लिए,
आसमाँ के आंसू लाया हूँ,
और,
सरहद पर के कुछ गोलियाँ लाया हूँ.
सीने पे मेरे जो जख्म हैं,
उन्हें अब तक रख के जिन्दा,
लाया हूँ.
मैंने राते काटी हैं,
बस पानी पी – पी के.
और भूख को जिस्म में,
छुपा के लाया हूँ.
दाल में मिले कंकड़ों को सहेजा है,
आज तक तुम्हारे लिए.
और खेत हुए दुश्मनों की,
लंबी सूचि लाया हूँ.
सरकार के दिए वेतन,
में से कुछ नहीं बचा पाया तुम्हारे लिए.
दुःख है, मगर इसके सिवा,
मैं तुम्हारे लिए, सेना की नौकरी से,
सब कुछ लाया हूँ.

This is written for Indian army man from BSF who recently claimed that his officers are not giving him good food. Its painful for me to see the bad treatment our army mans are facing.

परमीत सिंह धुरंधर

वक्षों पे धूप


रातों को ढल जाने दो,
सुबह को सीने में पल जाने दो.
दोपहर में,
मैं मिलूंगी तुमसे बलम जी,
मेरे तन पे ये धूप गिर जाने दो.
तुम मेरी कमर जब पकड़ते हो,
मैं कैसे फिर सोऊँ?
तुम्हारी उँगलियों के रहते मेरी जुल्फों में,
मैं कैसे अपनी आँखों में नींद लाऊं?
तुम ये रातों का दीप, पूरा जल जाने दो,
ये चाँद -तारे, उषा के आँचल में छुप जाने दो.
दोपहर में,
मैं मिलूंगी तुमसे बलम जी,
मेरी वक्षों पे भी थोड़ी ये धूप गिर जाने दो.

 

परमीत सिंह धुरंधर

कॉफी की एक चुस्की


जिंदगी में बहुत गम है,
कभी तुम मुस्कराओ, कभी हम मुस्करा लें.
माना की हम जीवन भर साथ नहीं रह सकते,
माना की हम जीवन भर साथ चल नहीं सकते।
पर कुछ और नहीं,
आवो कभी, इन ठंढी रातों में,
कॉफी की एक चुस्की ही साथ ले लें.
जिंदगी में बहुत काम है,
कभी तुम हाल पूछ लो मेरा, कभी हम तुम्हारा हाल पूछ लें.

 

परमीत सिंह धुरंधर

त्याग की महत्ता


त्याग जीवन में सबसे महत्वपूर्ण और महान काम है.  चाहे कलयुग हो या सतयुग हो, वीर वही है जिसने त्याग किया है. और गुरु गोबिंद सिंह जी से बड़ा त्यागी कोई नहीं। भगवान् राम एक अवतार त्रेता में और गुरु गोबिंद सिंह जी कलयुग में अवतार सिर्फ मानवता  को त्याग की महत्ता बताने के लिए हुआ था.

 

परमीत सिंह धुरंधर

M. S. Dhoni: The untold story


महेंद्र सिंह धोनी ने कप्तान के रूप में अपने आखिरी भाषण में प्रवीण जी का नाम लिया। इसके तुरन्त बाद CCMB में लोगो में आश्चर्य और बिषमय का भाव आ गया. तुरंत CCMB से नीरव राव ने जर्मनी में अपने साथी मेवेन्द्र सिंह को फ़ोन लगाया।
नीरव : भाई तुम क्या कर रहे हो? यहाँ धोनी ने अपने भाषण में प्रवीण सिंह हजेरी को धन्यवाद दिया है. तुम इतना क्रिकेट खेले तो क्या कबाड़ लिए?
मेवेन्द्र सिंह: अरे ऐसा क्या? लेकिन प्रवीण जी का नाम क्यों आया? उन्होंने क्या किया है? साला मैंने तो Nature छापा हैं और अभी कल रात में Cell में पेपर सबमिट किया है.
नीरव राव: भाई इसमें मुझे लगता है परमीत का हाथ हैं. तीनो सिंह मिल कर तुम्हे अलग कर दिए.
एक काम करो. जल्दी से अपनी ३० लोगो के सीनेट की बैठक बुलावो।
मेवेन्द्र: अब सिर्फ २८ हैं. याद नहीं, दो लोग साथ नहीं दिए, वरना आज धोनी मेरा नाम लेता अपने भाषण में.
जल्दी से २८ लोगो की अंतरराष्ट्रीय बैठक बुलाई गयी. बैठक में धोनी के भाषण में, मेवेन्द्र सिंह का नाम नहीं रहने पे लोगो ने अपना गुस्सा व्यक्त किया। सबसे सीनियर दुबे जी ने धोनी को पत्र लिखा और कहा की मेवेन्द्र उनका छोटा भाई है. उसके लिए वो आखिरी पल तक लड़ेंगे। अतः धोनी जी आप फिर से एक भाषण दें और मेवेन्द्र का नाम नहीं लेने के लिए माफ़ी मांगे। धोनी के इनकार करने पे, दुबे जी ने तुरंत दूसरी मीटिंग बुलाई, और घोषणा की हम लोग धोनी का वीजा रुकवायेंगे ताकि वो इंग्लैंड ना जा सके चैंपियंस ट्रॉफी खेलने।
आखिरी समय तक पता नहीं चला की दुबे जी सफल हुए या नहीं, लेकिन धोनी ने जिस प्रवीण जी का नाम लिया वो CCMB के प्रवीण सिंह हजेरी नहीं वल्कि उत्तर प्रदेश के प्रवीण कुमार है. प्रवीण कुमार वो ही क्रिकेटर हैं जिन्होंने धोनी के नेतृत्व में खेला है अंतरराष्ट्रीय मैचों में.

 

परमीत सिंह धुरंधर

इश्क़


तुमसे इश्क़ हुआ तो ज़माने को समझने लगे.
तुम्हारे पीछे है अब जमाना, मुझे लगाने को ठिकाने।

 

परमीत सिंह धुरंधर

प्रेम


प्रेम वही जिसमे मिलान हो,
विछोह तो गाय से बछड़े का होता है.
अभी मुख से स्तन छूट भी नहीं,
और खूंटे से इनको बंधन होता है.
प्रेम, वही, जिसमे ओठों से रसपान हो,
विछोह में तो मीरा को विषपान होता है.
अभी विरह में ह्रदय जी भर के रोया भी नहीं,
और मीरा को जग से जाना पड़ता है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

इश्क़


समुन्द्रों को बचा के रखो अपने,
इश्क़ में सबको रोना होता है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

नहीं रखूंगी अम्मा चुनर अपने बक्षों पे


कलम आपको वो समय देखने को शक्ति देती है, जो आप लाना चाहते हो. लेकिन आप विवस हो और नहीं ला सकते। कलम, आपको अपनी असफलताओं को छुपाने का माध्यम है. दुनिया के सबसे असफल आदमी की कलम ज्यादा मुखर होती है. ये पंक्तियाँ, उन लड़कियों और महिलाओं के लिए समर्पित है जिन्हें ३१ दिसम्बर २०१६ को बंगलोरे में शारीरिक उत्पीरण का सामना करना पड़ा. कुछ लोग बस जीवन में सिर्फ लड़कियों को पाना चाहते हैं. और मैं वो समय लाना चाहता हूँ जब कोई भी लड़की कैसे भी अपनी मर्जी से जीये और जी सके.

काले – काले मन के,
पहले भ्रम को,
कैसे तोड़ दूँ मैं?
मैं नहीं रखूंगी अम्मा,
चुनर अपने बक्षों पे.
गली-गली में गुजरती हूँ जब,
खुल जाते हैं, सब खिड़की-दरवाजे।
मेरी चाल पे बजाते हैं,
सीटी, बच्चों से बूढ़े।
अपनी नयी – नयी जावानी को,
नहीं ढकूँगी अम्मा, रखके,
चुनर अपने बक्षों पे.

परमीत सिंह धुरंधर

तुम अब जावां हो गयी हो


समुन्द्रों में अब तो, उठा दो लहरें,
तुम अब जावां हो गयी हो, बिखर दो ये जुल्फें।
तुम्हारा शर्माना माना की बहुत ही जायज है,
पर कभी तो बेशर्म बन कर, उठा दो ये पलकें।
कब तक काजल से ढकोगी खवाबों को सुला के,
कभी तो जिला दो इन्हें गिराके सब दीवारें।

 

परमीत सिंह धुरंधर