एक भीड़ लगा जाऊँगा


मैं धरती पे नहीं आया हूँ, मिटटी में बस मिल जाने को,
धरती का सीना फाड़ कर, कोई फसल खिला जाऊँगा।
बादल, दरिया, सब भले बैरी बन जाएँ,
तब भी फूल न सही, बबूल ही बसा जाऊँगा।
दर्जनों की भीड़ बैठती है बस शिकायतें करने को,
मैं तन्हा ही सही अपनी राहों में, पर एक भीड़ लगा जाऊँगा।
बहुत दूर तक चला हूँ, तन्हाई को ढ़ोते-ढ़ोते,
जब भी बैठूंगा कहीं, इनको सुलगा जाऊँगा।

 

परमीत सिंह धुरंधर

दोहरापन


तुम्हारा रूप देख, सूरज तपता है,
मगर तुम्हारी जिस्म को बस चाँद छूता हैं.
नहीं चाहिए वो हुस्न मुझे,
जिसकी जवानी उसपे ये दोहरापन लाता है.

परमीत सिंह धुरंधर

हुस्न की नियत


हम इकिस्वी शताब्दी में आ गए,
उनको शिक्षा मिली,
उनको अधिकार मिले,
नारी आज चाँद पे पहुँच गयी.
पर हुस्न की नियत पे हम क्या लिखे?
आज भी दस-दस पुत्रियों के,
माता-पिता नहीं चाहते की,
उनका पुत्र,
किसी लड़की के प्रेम में पड़े.

 

परमीत सिंह धुरंधर

बुढ़ापे का चिराग


जो इंसान,
परेशान है सारे शहर में.
शायद वो किसी का,
बाप हैं.
शायद उसका पुत्र,
पड़ गया है किसी के इश्क़ में.
और उसके बुढ़ापे का,
वो एक ही चिराग है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

शमा के आगोस में


समंदर जब अपने ज्वार-भाटे के उबाल पे था,
तब कसा था मैंने उसे अपने बाहों में.
मेरे मिटने के बाद, उतारी हैं जमाने ने,
कस्तियाँ अपनी उसके लहरों पे.
वो जो बखान करते हैं महफ़िल-महफ़िल
अपनी रातों का.
नहीं जानते की कितने परवाने सोएं हैं,
उनसे पहले, उनकी शर्मीली शमा के आगोस में.

 

परमीत सिंह धुरंधर

माँ


ज़माने भर की दौलत कमा कर भी,
एक प्यास नहीं मिटती।
खूबसूरत जिस्म को पाकर,
रातें तो काट जाती हैं.
मगर अपनी मिटटी की सरहदों से दूर,
वो मीठी नींदें नहीं मिलती।
किस्मत में सबकुछ पाकर भी,
कितना तरपता हूँ माँ तेरे लिए.
की आज भी मेरी थाली की रोटियों में,
वो खुश्बूं तेरे हाथों की,
और वो स्वाद नहीं मिलती।

 

परमीत सिंह धुरंधर

बिस्तर की चाहत


बिस्तर की चाहत क्या होती है?
ये उन जाड़े की रातों से पूछो।
जिनके ख्वाब टूट जाते हैं,
सुबह की किरणों से.
चादर की सिलवट क्या होती है?
पूछों उन रातों से, जो ढल जाती हैं,
अपने अधूरेपन को छुपाने में.

 

परमीत सिंह धुरंधर

इश्क़


हम उन मयखानों के नहीं,
जिनके प्याले टूटते नहीं।
हम उन सितारों के भी नहीं,
जो अपनी चाल बदलते नहीं।
हमने तो इश्क़ उससे किया,
जिसका नाम आज तक वफादारों में नहीं।
उस चाँद की आशिकी ही क्या?
जिसमे कोई दाग नहीं।
उस दरिया की मस्ती ही क्या?
जो अपने किनारों को डुबाता ही नहीं।
हमने तो इश्क़ उससे किया,
जिसका नाम आज तक वफादारों में नहीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

मस्ती में बहो मेरे बैलों


दुल्हन सी सजा दू धरती,
सावन सा आँचल इसका।
ऐसे मस्ती में बहो, मेरे बैलों,
की चमक उठे हर कोना इसका।
प्यासे हर कण की,
प्यास मिटा दूँ अपने पौरष से.
हर बदली, हर दरिया, फिर चाहे,
भिगोना बस आँचल इसका।

 

परमीत सिंह धुरंधर

माँ की रोटियां


जवानी का खेल है,
किसी के इश्क़ में रोना।
बुढ़ापे के आंसू तो बस, निकलते है,
याद कर माँ की लोरियाँ।
आसान नहीं,
हाथों को जला कर सेकना रोटियां।
समजह्ते हैं ये तब,जब थाली में,
पड़ती हैं जाली-भुनी रोटियां।
जावानी का खेल है,
सितारों में चाँद का देखना,
बुढ़ापे में तो,
चाँद-तारों,सबमे दिखती हैं,
बस माँ की ही रोटियां।
यूँ उम्र गुजार दी,
जिसे पाने को.
उसे पाकर, याद आती हैं,
बस माँ की रोटियां।

 

परमीत सिंह धुरंधर