हम तो उग्र्र हैं अपनी जवानी में


हम भी कम नहीं हैं उस्तादी में,
बस अंतर इतना है,
की वो मौन हो के खेलते हैं बाजियाँ,
और हम थोड़े वाचाल हैं अपनी जवानी में.
उनकी तमन्ना की रौंद दें हर किसी को,
और मैं तो रौंद ही देता हूँ,
जो टकराता हैं मुझसे मेरी राह में.
हम भी कम नहीं हैं छेड़खानी में,
बस अंतर इतना है,
की वो इंतज़ार में बैठे रहते हैं,
की कब एकांत हो.
और हम तो उग्र्र ही हैं अपनी जवानी में.

 

परमीत सिंह धुरंधर

हुस्न


टूट कर भी समंदर,
बिखरता नहीं।
ये दरिया है,
जिसकी किस्मत में ठहरना नहीं।
इश्क़ हमने भी किया है,
हुस्न के मिजाज में कहीं कोई वफ़ा नहीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

हुस्न


वफाये – मोहब्बत, हुस्न के आँचल में तो ना देख,
इनके अंगों पे ठहरता इनका आँचल भी तो नहीं।
दरिया की मिठास वही मुसाफिर याद रखते हैं,
जिनका घर कभी किनारों पे बसा ही नहीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

संसार


तुम मिले तो ख्वाब बने,
बन गया पूरा संसार।
और कोसिस की जो तुम्हे पाने की,
तो एक -एक कर, टूटा हर ख्वाब।
तुमने छल लिया नैनों से,
जाम छलका- छलका के.
तुम मिले तो प्यास जगी,
जग गयी पूरी हर रात.
और कोसिस की तुझे पीने की,
तो एक -एक कर, टूटा हर जाम.
तू बलखाई, तू अंगराई,
तू शरमाई हर रंग में.
और जो कोसिस की तुझे,
थामने की,
तो मिट गया हर प्यार।

 

परमीत सिंह धुरंधर

सिलवट – हल्दी


चलो हम कोई गुनाह कर लें,
तुम चाँद बनों, हम कोई दाग ही बन लें.
अगर ये बंटवारा न हो मंजूर,
मोहब्बत में.
तो हम काली सी कोई घटा बन लें,
तुम चमकती-करकती बिजली ही बन लो.
तुम कहो तो बरस जाएँ,
तुम कहूं तो बिखर जाएँ।
तुम यूँ ही आगोस में रहो,
ग़मों के हर तूफ़ान को सह जाएँ।
चलो हम भी एक हो जाएँ,
तुम दिया बन लो,
हम बाटी बन लें.
अगर ये बंटवारा भी न मंजूर हो,
मोहब्बत का.
तो तुम सिलवट बन लो,
हम हल्दी बन लें.
चलो हम कोई गुनाह कर लें,
तुम चाँद बनों, हम कोई दाग ही बन लें.
अगर ये बंटवारा न हो मंजूर,
मोहब्बत में.
तो हम काली सी कोई घटा बन लें,
तुम चमकती-करकती बिजली ही बन लो.

 

परमीत सिंह धुरंधर

वो अपने वक्षो पे चोली कस रही हैं


नादाने – दिल को संभालो यारों,
की दरियाँ में आग लग रही है.
प्यास है की मेरी मिटती नहीं,
और वो अपने वक्षो पे चोली कस रही हैं.
बस दो घड़ी का ही है प्यार उनका,
जिसकी कसमे को वरसों से खाती थी.
की अभी जी भर के चूमा भी नहीं,
और वो अपनी अंगिया पहन रही हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

ये जवानी तेरे वक्षों पे गुजरे


जिंदगी का हर बंधन, तन्हाई में गुजरे,
मगर ये जावानी तेरे संग एक चटाई पे गुजरे।
तू सरक न सके, मैं सरकने ना दूँ,
तू पलट न सके, मैं पलटने ना दूँ.
इसी जद्दोजहद में, पूरी रात यूँ ही लड़ाई में गुजरे।
मगर ये जावानी तेरे संग एक चटाई पे गुजरे।
तू सोचे की तेरे माँ – बाप ने कहाँ बाँध दिया,
मैं सोचूं की कमबख्त ये कहाँ फंस गया.
इसी पेशोपश में उम्र का हर लम्हा गुजरे।
मगर ये जवानी तेरे वक्षों पे गुजरे।
जिंदगी का हर बंधन, तन्हाई में गुजरे,
मगर ये जावानी तेरे संग एक चटाई पे गुजरे।

 

परमीत सिंह धुरंधर

माँ


शरीर कितना भी थक जाए माँ का,
मन नहीं थकता।
पुत्र अगर समीप हो तो,
घर का चूल्हा कभी नहीं बुझता।
जो भी चाहो, जब भी चाहो,
पक कर गर्म थाली में मिलता।
शरीर कितना भी थक जाए माँ का,
मन नहीं थकता।

 

परमीत सिंह धुरंधर

सैयां खोले ला चोलिया हमार


सैयां खोले ला चोलिया हमार,
गुलेलिया मार-मार के.
सैयां खूबे ने खिलाड़ी बा हमार,
चूमे ला गालिया, बात – बात पे.
सखी, का कहीं, कइसन बारन,
सखी, का कहीं, का -का करेलन।
सैयां ढूंढे ला ढोढिया हमार,
अंखिया पे रुमाल बाँध के.
सैयां खूबे ने खिलाड़ी बा हमार,
चूमे ला गालिया, बात – बात पे.
घडी – घडी पास आके,
पूछे कब होइ रात,
दुनिया के अनाड़ी,
सेजिया पे बाटे नु चालाक,
सैया काटे ला दही सजाव,
अँखियाँ में आँख डाल के।
सैयां खूबे ने खिलाड़ी बा हमार,
चूमे ला गालिया, बात – बात पे.

 

परमीत सिंह धुरंधर

रामाश्रय सिंह : एक योद्धा


चिलचिलाती धुप हो,
या हो कड़कड़ाती सर्दी।
बैल उसके बहते रहते,
ना सुनी पड़ी,
कभी उसकी धरती।
एक योद्धा था, एक योद्धा था,
रामाश्रय सिंह एक योद्धा था,
जिसके लिए रोई थी उसकी माटी।
गड़ासे चले, कुल्हाड़ी चली,
कोर्ट में चले कितने मुक़दमे।
फिर भी बाँध ना सके उस अकेले को,
सौ -सौ, भी एक बार, मिल के.
एक योद्धा था, एक योद्धा था,
जिसके लिए रोई थी उसकी माटी।
छपरा से कलकत्ता तक,
बस जिसके नाम की ही एक गूंज थी.
साभाओं -महासभाओं में जिसकी ही बस,
चली और बोलती थी.
एक योद्धा था, एक योद्धा था,
जिसके लिए रोई थी उसकी माटी।
ज्ञानी इतना ज्ञान में, जिसका न कोई सानी,
रामायण – महाभारत के किस्से,
जिसने सुनाये मुझे मुहजाबानी।
गर्व है मुझे की मेरे नस – नस में,
दौड़ता रुधिर, है उस योद्धा की निशानी।
एक योद्धा था, एक योद्धा था,
रामाश्रय सिंह एक योद्धा था,
जिसके लिए रोई थी उसकी माटी।

 

परमीत सिंह धुरंधर