गरीब


इतना गरीब हूँ मैं,
इतना गरीब हूँ।
मुझे कोई ख़्वाब नहीं,
मैं बेबस हूँ, लाचार,
मुझे उनसे प्यार नहीं।
सोच-सोच के आती है नींदे,
और ओस की बूंदों सी उड़ जाती है।
लेटे-लेटे चारपाई पे मैं,
बस तारे गिनता हूँ।
इतना गरीब हूँ मैं,
बस पानी पीता हूँ।
मुझे कोई ख़्वाब नहीं,
मुझे उनसे प्यार नहीं।
वो ढूंढे सोना -चांदी,
मेरे तन पे कपड़े नहीं।
उनके आँखों में हज़ार सपने,
मेरा कोई ठौर नहीं।
वो रातों को भी हंसती हैं।
मैं दिन में भी शांत बैठता हूँ।
इतना गरीब हूँ मैं,
पुवाल पे सोता हूँ।
मुझे कोई ख़्वाब नहीं,
मुझे उनसे प्यार नहीं।

परमीत सिंह धुरंधर

दर्द


ये दर्द जो तेरे दिल में है,
इसे कही, दबा दे, दफना दे,
मिटा दे, कुछ कर दे,
या तो जला दे.
इसे किसी को बताने में क्या रखा है.
और जब उन्हें ही नहीं है,
तेरे दर्द से वास्ता,
तो फिर किसी और से,
उम्मीद क्यों लगा के रखा है.
बहुत गिरे हैं इस राहे-मंजिल में,
मेरी मान मेरे दोस्त,
उनके बिकने से,
तेरा गिरते रहना है अच्छा है.

परमीत सिंह धुरंधर

तितली


मशहूर था जब मैं तब वो,
एक तितली बन कर आयीं।
मेरे उपवन के पुष्पों पे,
पंखों को फैला के मण्डराई।
जब युद्ध छिड़ा मेरा सावन से,
सूरज ने जोर लगाई।
जब सूखने लगे फूल मेरे,
बादलों ने ना अपनी बूंदें बरसाई।
तब वो तितली ने कही और जाकर,
दूसरे उपवन में घर बसाई।

परमीत सिंह धुरंधर

रिश्ता


खूबसूरत वादियां बस खूबसूरत ही होती हैं,
वो भी बहुत ग़मगीन होती हैं,
रिश्तों की नजाकत को ऐसे समझा करो,
हर नजर अँधेरे में रोती है.

परमीत सिंह धुरंधर

कमाई


पैसो को कैसे -कैसे हमने कमाया है,
कहीं माँ, कहीं हम तो कहीं घर है.

परमीत सिंह धुरंधर

मुसाफिर


जिंदगी इस कदर तनहा रह गयी,
मैं मुसाफिर ही रह गया, मंजिलें खों गयी.

परमीत सिंह धुरंधर

खजाना


अकेला हूँ पर खुशियों का खजाना है.
कल तक सूखे इस उपवन में आज,
फिर से भौरों का आना जाना है.
मैं तो अँधेरे में हूँ पर आज पता चला,
हम से कितनों की उमिद्दों का जमाना है.

परमीत सिंह धुरंधर

अमीर


फकीरों की बस्ती में हम अमीर बन गए हैं,
दिल को चिराग बना के, उन सबकी तक़दीर बन गए हैं.
रौशनी तो कभी थी ही नहीं मेरी, जानते थे हम ये बात,
पर आज हर एक रौशनी का वजीर बन गए हैं.

परमीत सिंह धुरंधर

बस्ती


दो जून को कहते हैं मुश्किल से, पर मुस्करा कर मिलते हैं,
ये बस्ती ही कुछ ऐसी है, जहाँ सब इठला कर चलते हैं.

परमीत सिंह धुरंधर

भूल


भूल हुई है तो सुधारो,
ना सुधरे तो भूल जावो वो भूल नहीं होती।
मोहब्बत कभी पाक नहीं होती,
आइना उत्तर के देखो,
सच्चाई कभी सफ़ेद नहीं होती।
मशगूल हो गए हो जिन बाहों में जाकर,
रात ढलने दो फिर देखो,
माशूमियात कभी इतनी खामोस नहीं होती।
उलाहने मिलते रहेंगे यूँ हैं हर कदम पे,
हुस्न बिना जिरह के कभी शांत नहीं होती।

परमीत सिंह धुरंधर