तेरी तस्वीरों को देखकर,
जीने वालों में मैं नहीं.
मेरा प्रेम तो सागर है,
इसमें किनारों का बंधन नहीं.
लहरे उठने लगीं हैं,
तुम्हे भिगोने को.
एक कदम तो तुम इधर उठाओं,
अब कुछ भी असंभव नहीं.
परमीत सिंह धुरंधर
Every thing is related to love and beauty
तेरी तस्वीरों को देखकर,
जीने वालों में मैं नहीं.
मेरा प्रेम तो सागर है,
इसमें किनारों का बंधन नहीं.
लहरे उठने लगीं हैं,
तुम्हे भिगोने को.
एक कदम तो तुम इधर उठाओं,
अब कुछ भी असंभव नहीं.
परमीत सिंह धुरंधर
ओ शाम्भवी, वो शाम्भवी,
तुझसे ही है मेरी हर ख़ुशी।
संग ही तेरे खेलना है,
अब तो जीवन की हर होली।
सागर की लहरें हों,
और तुम हमारे साथ.
किनारों पे बैठें हम,
देखें एक साथ ये आसमान।
हर तारे की गिनती पे,
हो तेरे करीब आने का अहसास।
तेरे मिलने के बाद ही,
मेरी हर प्यास है बढ़ी.
ओ शाम्भवी, वो शाम्भवी,
तुझसे ही है मेरी हर ख़ुशी।
परमीत सिंह धुरंधर
ग़मों की रातें, हैं छट रहीं.
कोई आ रहा हैं ख़्वाबों में.
दूर तक हैं रौशनी,
बिना चाँद के ही आसमानों में.
हवाएँ भी उठने लगीं,
न जाने क्यों साथ मेरे बहने को.
हर दर्द है मिट रहा,
बिना मेरे फरियादों के.
ग़मों की रातें, हैं छट रहीं.
कोई आ रहा हैं ख़्वाबों में.
परमीत सिंह धुरंधर
ग़मों की ऐसी रात हो,
तुम्हारी जुल्फें,
मेरे सीने पे बिखरीं हों.
मेरी आँखों से बरसते आंसूं,
तुम्हारी गालों पे थिरकती हों.
थका, निराश मन, हार कर,
तुम्हारी आगोस में पनाह ले.
और एक नयी सुबह के जोश में,
उठे, बढे, संग तुम्हारे,
एक नईं मंजिल की और.
अंततः,
तुम्हारे अंगों पे,
मेरे जंगे-जीत की निशानी हों.
ग़मों की ऐसी रात हो,
तुम्हारी जुल्फें,
मेरे सीने पे बिखरीं हों.
परमीत सिंह धुरंधर
नसीब, दो ही हैं.
आवो, उन्हें बदल लें.
फिर भी, तुम्हे डर है.
तो ये वादा है,
दर्द तुम्हारें, मेरे।
और खुशियाँ मेरी,
सब तुम्हारी।
XXXXXXXXXX
आज फिर,
किसी से मोहब्बत हो गयी.
हाथों से दूर, आँखों से दूर,
ओठों से दूर, किस्मत से भी दूर,
मगर, फिर भीं उनकी चाह हो गयी.
कर्क राशि की वो लड़की,
इतनी ख़ास लगी.
मार्च में ही सेप्तेम्बर,
कर गयी.
आज फिर,
किसी से मोहब्बत हो गयी.
XXXXXXXXXX
यूँ तो निगाहें शरारत करेंगी,
मगर तुम मिलो तो पर्दा करेंगी।
जवाँ हसरते हैं, दबाऊं मैं कैसे,
वरना फिर मुझसे ही झगड़ा करेंगी।
लहराती हैं आँचल तुम्हारे लिए,
तुम्हारे लिए ही आँखें सवरतीं।
हर एक दरवाजे पे लगी हैं ये,
मगर तुम्हारे ही आहट से डरतीं।
यूँ तो साँसें पिघलती हैं रात दिन,
मगर तुम मिलो तो दुप्पट्टा करेंगी।
जवाँ हसरते हैं, दबाऊं मैं कैसे,
वरना फिर मुझसे ही झगड़ा करेंगी।
परमीत सिंह धुरंधर
तड़प रहा हूँ सीने पे जख्म को लिए,
कहीं तो मिल ए दिलवर, नकाब को गिरा के.
परमीत सिंह धुरंधर
मेरी पलकें अभी तक हैं भींगी-भींगी,
उनका चेहरा झुर्रियों से सवरने लगा।
वो भूल गयीं जिन पेड़ों की छावं,
उनकी शाखाओं पे फिर न कोई पुष्प खिला।
राहें – किस्मत को देखा मैंने बदल – बदल कर,
उनकी झोली में पुष्प और मुझे बस काँटा मिला।
परमीत सिंह धुरंधर
औरत कितना भी शोर मचा ले,
कोई नहीं सुनता.
लेकिन, जब माँ को गुस्सा आता है तो,
कैसा भी बाप हो वो शांत हो जाता है.
परमीत सिंह धुरंधर
जब ग़मों की रात हो, प्रिये,
तुम ओठों से पिला देना।
जब नींदें न हों आँखों में,
ख़्वाब न हो जीने को.
तुम आँचल अपने सरका के,
अंगों को छलका देना।
कांटे – ही – कांटे हो पथ में,
और प्यास से कंठ भी अवरुद्ध हो.
तुम आँखों की मदिरा को अपने,
मेरे नस – नस में उतार देना.
जब तुम ही मेरे साथ तो,
तब विकत क्या है कोई प्रण मेरा.
मेरे हर पराजय पे भी तुम यूँ ही,
विजय श्री का मीठा चुम्बन लगा देना.
परमीत सिंह धुरंधर
अबकी बरस रानी, अबकी बरस,
तहरा के उठा के ले जाएं।
सावन बरसे या न बरसे,
अंग – अंग ताहर भिंगो देहम।
परमीत सिंह धुरंधर