मेरा इश्क़ मेरा इश्क़ है,
उनका हुस्न मेरा नहीं।
चाहत तो मुझे उन्ही की है,
मगर उनका जिस्म मेरा नहीं।
ये न इबादत है,
ना कोई जद्दोजहद उन्हें पाने की।
धड़कनो में मेरे महक है,
बस उन्हीं के आँचल की।
परमीत सिंह धुरंधर
Every thing is related to love and beauty
मेरा इश्क़ मेरा इश्क़ है,
उनका हुस्न मेरा नहीं।
चाहत तो मुझे उन्ही की है,
मगर उनका जिस्म मेरा नहीं।
ये न इबादत है,
ना कोई जद्दोजहद उन्हें पाने की।
धड़कनो में मेरे महक है,
बस उन्हीं के आँचल की।
परमीत सिंह धुरंधर
मैं बहारों सी आई हूँ,
तू इश्क़ बनके छा जा.
मैं रेशम की धागा सी,
तू उसमे गाँठ बनके पड़ जा.
मैं बलखाऊं, लहराऊं, हवाओं सी,
तू मेरी राहों में पर्वत बनके आजा.
जब शाम ढले, तू ताड़ छेड़े,
मेरी रातों को बादल बनके भिंगो जा.
परमीत सिंह धुरंधर
प्रयास है जमाने का,
हमको मिटाने की.
मेरा संघर्ष भी जारी है,
हर गम में मुस्कराने की.
अकेला ही खड़ा हूँ,
एक दिन तो गिरना है.
पर अपनी भी चेष्टा हैं,
सबको झुठलाने की.
बादलों ने मुख मोड़ा है,
हवाओं ने रुख बदला है.
सब विरुद्ध में हैं खड़े,
पर माँ संग में है लेके,
दुवाओं की झोली।
प्रयास हैं लहरों का,
हमको उखारने की.
मेरा संघर्ष भी जारी है,
अपने हर निशाँ को बचाने की.
प्रयास है जमाने का,
हमको मिटाने की.
मेरा संघर्ष भी जारी है,
हर गम में मुस्कराने की.
परमीत सिंह धुरंधर
जब से जवान भइल बारु,
धनिया से धान भइल बारु.
चमकअ तारु, चमकावअ तारु,
नाक में नथुनिया डाल के.
लहकअ तारु, लहकावअ तारु,
योवन पे चुनरी डाल के.
पूरा खिल के खलिहान भइल बारु,
जब से जवान भइल बारुं,
धनिया से धान भइल बारु.
रूप ताहर नयका,
रंग ताहर नयका.
सोना के भाव भइल बारु,
जब से जवान भइल बारुं,
धनिया से धान भइल बारु.
महकअ तारु, महकावअ तारु,
केसिया में गजरा डाल के.
छलकअ तारु, छलकावअ तारु,
अँखियाँ में कजरा डाल के.
सरसो से महुआ भइल बारु,
जब से जवान भइल बारु,
धनिया से धान भइल बारु.
लहर उठा दअ ,
जहर पिला दअ.
अंग-अंग से गुलाब भइल बारु,
जब से जवान भइल बारु,
धनिया से धान भइल बारु.
परमीत सिंह धुरंधर
जमाने ने हमें सराहा नहीं,
और हमने कभी हार मानी नहीं।
उस तरफ हैं महफ़िलें,
और उनकी दीवालियाँ,
और हमने अभी तक जुगनुओं से,
अपनी ये दोस्ती तोड़ी नहीं।
सुख, सत्ता और खूबसूरत जिस्म की चाह में,
कुछ दोस्त उधर जाके बैठ गए।
सम्मान, दौलत और आगोश की लालसा में,
हुस्न वाले भी वहीं के होके बस गए।
झुलस रहा है मेरा तन धुप में,
और कंठ तरस गया है, दो बून्द पानी को।
वीरान और सुनसान, इन शाखाओं को,
फिर भी, जाने क्यों और किस उम्मीद में,
अभी तक हमने छोड़ा नहीं।
क्या दौलत सजों के रखें हम,
और किस लिए।
पिता के जाने के बाद,
किसी और गोद में,
जब अब तक मैं बैठा नहीं।
जमाने ने हमें सराहा नहीं,
और हमने कभी हार मानी नहीं।
परमीत सिंह धुरंधर
भैंसे,
दौड़ती हुई,
आनंद देतीं हैं.
खुरों से रोंद्ती,
उड़ाती हुई,
धूलों को.
अपने सींगों पे,
उछलती,
हवाओं के दम्भ को.
योवन से भरपूर,
उन्नत अपने स्तनों से,
विषधर को भी,
पागल कर देतीं हैं.
भैंसे,
दौड़ती हुई,
आनंद देतीं हैं.
काली हैं,
पर मतवाली हैं.
घंटों, तालाब में बैठी,
पगुराती हैं.
हरी – हरी दूबों को,
चरती, लहराती,
दो नयनों से अपने,
उपवन को मधुवन,
बना देती हैं.
भैंसे,
दौड़ती हुई,
आनंद देतीं हैं.
परमीत सिंह धुरंधर
ओ प्रियतमा,
ओ प्रियतमा,
जब भोर हुई, तुम प्यारी लगी,
सूरज की प्रखरता सी.
जब रात हुई, तुम मधुर लगी,
चाँद की शीतलता सी.
इस नीरस जीवन में, तुम पुष्प सी,
सुगन्धित हो.
हर दोपहर की धुप में, हवा के,
थपेड़ो सी संग हो.
ओ प्रियतमा,
ओ प्रियतमा,
मेरे ह्रदय के हर दुःख में,
मेरे कापंते अधरों की तमन्ना हो.
मेरे हर सुख में, तुम मेरे,
बाहों का मंथन हो.
ओ प्रियतमा,
ओ प्रियतमा।
परमीत सिंह धुरंधर
तुम्हे इतना प्यार दिया है,
की अब निगाहें धरती पे हैं.
रातों को दिया जल के,
बेचैनी मेरे सिराहने पे है.
परमीत सिंह धुरंधर
खूबसूरत जिस्म पे,
अब भी है,
रातों का दाग.
खिड़कियाँ,
बंद ही रहने दो.
मुझे उजालों की नहीं,
अब भी,
इन ओठों की हैं प्यास।
ऐसा क्या है,
इन दिन- दोपहर में,
जो तुम मुझसे दूर भागती हो.
मत डालो,
ये उतारी हुई चुनर,
मुझे अब भी हैं,
इन अंगों की तलाश।
परमीत सिंह धुरंधर
उनकी आँखों से नशा लेकर,
रातो को वफ़ा देता हूँ.
मोहब्बत ही कुछ ऐसी है,
की साँसों -साँसों में जीता हूँ.
बखान नहीं हो सकता शब्दों में,
रिस्ता उनसे, ये मेरा।
हर पल में उनसे मैं,
अंजाना सा मिलता हूँ.
अब कल ही की तो बात है,
जब वो पास आयीं थी.
बाहर बरस रहे थे बादल,
अंदर एक दम, नयी उनकी अंगराई थी.
उनके जुल्फों के बोझ से दबा मैं,
और मेरे घुटते साँसों पे वो मुस्कराई थीं.
परमीत सिंह धुरंधर