पिता


पिता ने दी है ये जिंदगी,
पिता पे ही लूटा दूंगा ये जिंदगी।
बिन पिता कुछ भी नहीं,
हैं ये जिंदगी।
तुम्हारे लिए छोड़ दिया है,
धर्म – ज्ञान की गाथा।
मैं तो लहराता रहूँगा,
अपने पिता का पताका।
पिता ने सींचा है मेरे प्राणों को,
पिता पे ही लूटा दूंगा अपने प्राणों को.
बिन पिता कुछ भी नहीं,
प्राणों की ये वेदी।

परमीत सिंह धुरंधर

माँ


हम जिस तहजीब की तरफ बढ़ रहें हैं दोस्तों,
वहाँ महबूब तो कई हैं, सर्द रातों में,
जिस्म को सहलाने को.
मगर, हम जिस माटी को छोड़ रहें हैं दोस्तों,
वहाँ माँ आज भी अकेली है, राह देखती,
हमारे लौट आने को.

परमीत सिंह धुरंधर

माँ


वो करती है गुजरा, थाली में बचे चाँद चावल के दानें से.
माँ तो मात देती भूख को भी, बस बेटे के मुस्कराने से.

परमीत सिंह धुरंधर

यकीन


मुझे पीने का शौक हैं,
तू पिलाने की शौक़ीन बन.
छोड़ ये वफ़ा, बेवफाई की बातें,
तू एक बार तो,
इन बादलों की जमीन बन.
मुझे बरस कर,
मिट जाने का डर नहीं।
तुझे भींग कर,
लहलहाने में भय है.
कब तक टकटकी लगाओगे,
खुदा के दर पे मदद की,
कभी तो अपने योवन का यकीन बन.

परमीत सिंह धुरंधर

वो रानी


दो तेरी पलकें वो रानी,
दो ही मेरे ख़्वाब हैं.
छोटे से इस आसमान का,
तू ही एक चाँद है.
दो तेरे नखरे वो रानी,
दो ही मेरे अरमान हैं,
इस छोटी सी सल्तनत की,
तू ही एक तख्तो-ताज है.

परमीत सिंह धुरंधर

दर्द


उनकी उम्र की खबर तो सारे जमाने को हैं,
मेरा दर्द कोई तौल दे तो जाने.
उनके आँचल से तो ख़्वाब सब बुनते हैं,
मेरा ख़्वाब तौल दो तो समझें.

परमीत सिंह धुरंधर

इश्क़


हम इश्क़ तुमसे करते रहें, और शिकायत खुद से.
तुम्हारी बेवफाई पे भी, हम अपनी वफ़ा ढोते रहें.

परमीत सिंह धुरंधर

बीमार – सास


पायल छनकअता रात- रात भर,
बालम अइसन बा तहार ई प्यार।
टूट गइल शर्म के सारा दीवार,
बालम अइसन बा तहार ई प्यार।
मायका से आईल बा चिठ्ठी,
घरे बुलावाव तारी माई।
लिखदअ बालम तनी ई जवाब,
बीमार बारी सास हमार।
बालम अइसन बा तहार ई प्यार।
पायल छनकअता रात- रात भर,
बालम अइसन बा तहार ई प्यार।
टूट गइल शर्म के सारा दीवार,
बालम अइसन बा तहार ई प्यार।

परमीत सिंह धुरंधर

मोहब्बत


वो क्या समझेंगें मेरी मोहब्बत को,
जो बस शाहजहाँ का नाम उछालतें हैं.
हम तो बिना मुमताज़ के ही,
इश्क़ में अपना सब कुछ लूटा गए.

परमीत सिंह धुरंधर

चाहत


अभी तो तुझसे मिली हूँ मैं,
अभी तो हाँ खिली हूँ मैं.
अभी तो चाँद बनी हूँ मैं,
अभी तो महफ़िल में जली हूँ मैं.
अभी न मुझसे ऐसी बात कर,
ए मुसाफिर, मुझे बाँध कर.
अभी तो आँख लड़ी है ये,
अभी तो साँझ ढली हैं ये .
थोड़ा और खुमार चढ़ने दे,
अभी तो साँसे बहकी हैं ये.
मुझे ना, घर की राह दिखा,
ना, बाबुल का नाम बता.
अभी तो प्यास जगी है मेरी,
अभी तो चाहत बढ़ी है मेरी.

परमीत सिंह धुरंधर