उम्मीद


मयखाने सारे सुख गए,
नजराने सारे खो गए.
कोई कैसे जिए,
कब तक उम्मीदों के सहारे.
जब सबके घर,
यहाँ बस गए.

परमीत सिंह धुरंधर

संयम


धीरे-धीरे विचलित हो रहा है मन, रूप तेरा देख के,
संयम कैसे रखूं, बता जरा अपने नयनन से.
कोई सजा, मौत की भी परवाह नहीं,
एक बार मिल जाए अधर मेरे तेरे अधरों से.

परमीत सिंह धुरंधर

बिंदिया


उसका नाम था बिंदिया,
सावलें बदन पे,
रखती थी जो दो चंचल अँखियाँ।
कैसे ना डूबता,
उसके प्यार के सागर में,
एक ही मुस्कान से उदा देती थी,
जो रातों की निंदिया।
अच्छे पल थे,
सुनहरे कल के सपनों में।
मुझे क्या पता था की,
मेरी जल जायेगी दुनिया।
इल्जाम मुझपे ही आये सारे,
कुछ पल मैं भी,
गम और शिकायत में जिया।
मगर, यहाँ से अब न शिकायत है,
न कोई कोसिस।
बस याद आती है,
उनकी वो बेवफाई,
और उनकी मीठी बतिया।

परमीत सिंह धुरंधर

इश्क़


इश्क़ इतना भी न कीजिये,
की उनके रहमो-करम पे हों साँसें।
दिल जलता है तो जल जाए,
हमें नहीं चाहिए वैसी रातें।

परमीत सिंह धुरंधर

हुजूर


मुझसे मत पूछो इन आँखों का कुसूर,
शहंशाह तो मैं ही आज भी, पर वे हैं मेरे हुजूर।
जुल्म भी उनकी और हम उफ़ तक न करे,
खिदमत भी उनकी और वो खुश न रहें,
की मोहब्बत का बस एहि है दस्तूर।

परमीत सिंह धुरंधर

चाहत


मेरी धमनिकाओं में रक्त प्रवाहित है,
तुम्हारी साँसों की चाहत में.
और मेरी साँसों में स्पंदन प्रज्जवलित है,
सिर्फ तुम्हारी धमनिकाओं की आहट से.

परमीत सिंह धुरंधर

माँ


मैं अपनी माँ की चरणों को,
गंगा समझता हूँ,
मुझे धर्म से क्या लेना देना,
मैं तो रोज ये तीर्थ करता हूँ.
मैं अपनी माँ की बोली को,
गीता समझता हूँ.
मुझे वेद-पाठ से क्या लेना देना,
मैं तो ये ही कर्म रोज करता हूँ.
मैं तो अपनी माँ के हाथों के खाने को,
प्रसाद समझता हूँ,
मुझे कथा-वाचन से क्या लेना देना,
मैं तो रोज ये ही पुण्य कमाता हूँ.

परमीत सिंह धुरंधर

गरीब


इतना गरीब हूँ मैं,
इतना गरीब हूँ।
मुझे कोई ख़्वाब नहीं,
मैं बेबस हूँ, लाचार,
मुझे उनसे प्यार नहीं।
सोच-सोच के आती है नींदे,
और ओस की बूंदों सी उड़ जाती है।
लेटे-लेटे चारपाई पे मैं,
बस तारे गिनता हूँ।
इतना गरीब हूँ मैं,
बस पानी पीता हूँ।
मुझे कोई ख़्वाब नहीं,
मुझे उनसे प्यार नहीं।
वो ढूंढे सोना -चांदी,
मेरे तन पे कपड़े नहीं।
उनके आँखों में हज़ार सपने,
मेरा कोई ठौर नहीं।
वो रातों को भी हंसती हैं।
मैं दिन में भी शांत बैठता हूँ।
इतना गरीब हूँ मैं,
पुवाल पे सोता हूँ।
मुझे कोई ख़्वाब नहीं,
मुझे उनसे प्यार नहीं।

परमीत सिंह धुरंधर

महफ़िल


अब मैं महफ़िल में नहीं,
मयखानों में बैठा हूँ,
महफ़िल की शान तो वो हैं,
जिनकी यादो का ये जाम,
मैं उठाये बैठा हूँ.

परमीत सिंह धुरंधर

दर्द


ये दर्द जो तेरे दिल में है,
इसे कही, दबा दे, दफना दे,
मिटा दे, कुछ कर दे,
या तो जला दे.
इसे किसी को बताने में क्या रखा है.
और जब उन्हें ही नहीं है,
तेरे दर्द से वास्ता,
तो फिर किसी और से,
उम्मीद क्यों लगा के रखा है.
बहुत गिरे हैं इस राहे-मंजिल में,
मेरी मान मेरे दोस्त,
उनके बिकने से,
तेरा गिरते रहना है अच्छा है.

परमीत सिंह धुरंधर