निराला सैयां


हमर सैयां बारन बड़ा निराला,
जतना खालन मीठा ओतने तीखा।

परमीत सिंह धुरंधर

सैयां के हाल


सुबह होते कहलन सैयां,
अंखिया में काजल लगावेला।
रतिया में सैयां खुदे,
सारा काजल चुरा लेहलन।
का कहीं सखी,
आपन सैयां के हाल,
दिनवा में पहनाके सब सोना-चाँदी,
रतिया में देहिया से झार लेहलन।

परमीत सिंह धुरंधर

कलम और दिल


बहुत लिखूंगा ए कलम तुझे अपना बनाकर,
किसी सितमगर-जालिम से अपना दिल लगाकर।

परमीत सिंह धुरंधर

राजा जी


सैयां तहरे जवानी के किस्सा रहल,
जो कचहरी में चलल रहल.
पंच-प्रमुख भी का करियन तहरा के,
उनकरो घरे त ताहर काँटा फसल रहल.
बड़ा कइलअ तू मनमानी राजा जी,
गाउँवा में सबके बनइलअ तू नानी राजा जी.
छोड़अ अब ई सब धंधा हमरो पर धयान द राजा जी,
अब संभालअ तू आपन घर और दुआर राजा जी.

परमीत सिंह धुरंधर

दरिया


इतना मत सोच दिल मोहब्बत की नाकामियों पे,
जिंदगी में तुझे और भी बोझ उठाना बाकी है.
कब तक झुकाएगा खुद को खिदमत में किसी की,
अभी इबादत में में सर को झुकाना बाकी है.
और कितना भागेगा अपनी प्यास मिटने के लिए,
अभी तेरा इस जिंदगी में दरिया तो बनना बाकी है.

परमीत सिंह धुरंधर

ताज


मोहब्बत वो शौक है जालिम,
जो सिर्फ जमाने को दिखने के लिए है.
वरना उनके आगोश में गए,
अब तो जमाने गुजर गए.
ताज भी बनाया तो उनकी मौत के बाद,
एक सुकून पाने में जिनको जमाने गुजर गए.

 

परमीत सिंह धुरंधर

मोहब्बत


अब क्या मोहब्बत करूँ, जो शौक था मेरे,
तूने तोड़ दिया, मैंने छोड़ दिया।

 

परमीत सिंह धुरंधर

काला तिल


इतना खूबसूरत जिस्म,
पे ये काला तिल.
खुद ने लगा के तुम्हे उतरा है,
सबका दिल चुराने के लिए.
हम कहाँ तक खुद को बचाएं,
ये सितम तो है सबके उठाने के लिए.
तू मोहब्बत दे, या ठुकरा दे,
ये है तेरी मर्जी.
हम तो आते रहेंगे तेरे दर पे,
ये फ़रियाद सुननाने के लिए.

 

परमीत सिंह धुरंधर

 

अकेला


सुबह इतनी बारिश हुई,
की मैं शाम तक गीला रहा.
जिस रात हमें तुम छोड़ गयी थी प्रिये,
मैं सागर के तट पे टहलता रहा.
उठती हुई लहरो के बीच,
मैं अकेला ही जूझता रहा.
अनुकूल नहीं वो प्रतिकूल पल था,
विफल रही हर एक योजना।
मज़धार में फंसा मैं,
तेरी तस्वीर को संजोता रहा.

 

परमीत सिंह धुरंधर

काबिल नहीं है


वो बैठी हैं अपने कमरे में,
एक तस्वीर को सीने से लगाये.
की कल तक जिस दिल में हम बसते थे,
उस दिल में किसी और को छिपाए.
हमने पूछा की हुजूर,
क्या रखा है सीने में छुपा के.
वो मुस्कराये, खूब मुस्कराये,
राज को सीने में गहरा दबा के.
फिर हौले से बोले आँचल को संभाल के,
कुछ राज सीने में ही अच्छे है,
वो होठों के काबिल नहीं हैं.
अपनी मोहब्बत का वास्ता दे कर,
जब हमने मिलना चाहा।
बड़े प्यार से मेरे महबूब ने,
संदेसा भिजवाया.
मेरे बाबुल का समाज में रुतबा है,
ये मोहब्बत अब उसके काबिल नहीं है.

 

परमीत सिंह धुरंधर