तरसने वाले तरसते रह गए,
उड़ाने वाले उड़ा ले गए.
हमें नहीं मालुम हुस्न और चिड़िया में अंतर,
शिकारी दाना दाल के, दोनों ले गए.
परमीत सिंह धुरंधर
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तरसने वाले तरसते रह गए,
उड़ाने वाले उड़ा ले गए.
हमें नहीं मालुम हुस्न और चिड़िया में अंतर,
शिकारी दाना दाल के, दोनों ले गए.
परमीत सिंह धुरंधर
तेरी पलकों पे सबेरा, तेरी पलकों से मेरी शाम है,
पर मेरी किस्मत में एक रात ही नहीं।
रोजा रखता हूँ, सजदा करता हूँ,
सब दिया मौला ने पर मेरी किस्मत में जन्नत ही नहीं।
परमीत सिंह धुरंधर
क्या ढूंढता है इन आँखों में तू,
सितारे चाहिए या चाँद ढूंढता है तू.
दे सकती हूँ चंद राते चांदनी की मैं,
या पूरा आसमान ढूंढता है तू.
जाम का मज़ा हलके-हलके छलका के पीने में हैं,
या एक बार में ही गटकना चाहता है तू.
किस्मत है तेरी, पूरा मज़ा ले,
या प्यास अपनी मिटाना चाहता है तू.
परमीत सिंह धुरंधर
कहाँ तक जला के रखूं उमिद्दों का दिया,
हवाओं का रुख तो मेरे हाथ में नहीं।
मोहब्बत तो बहुत है उनको हमसे,
रिश्तों को निभाना उनकी फितरत नहीं।
क्यों करते हो शिकायत हुस्न से,
वो क्या वफ़ा करे जब तेरी किस्मत नहीं।
परमीत सिंह धुरंधर
उम्र बढ़ रही है मेरी,
दिल अभी भी वहीँ है.
दुपट्टा नहीं अब आँचल है सीने पे,
पर निगाहें अभी भी वहीँ है.
कहती हैं हमसे हर बार की भूल जाओ,
कोई समझा दे उन्हें, तन ढल रहा है,
पर मेरी मुरादें अभी भी वहीँ हैं.
परमीत सिंह धुरंधर
रातें पहले भी काली थी, राते अब भी काली हैं,
पहले उनका कमरा खाली था, अब मेरा कमरा खाली है.
सजा दे गयी ये कह के की अब हाथ न आउंगी,
मेरा दिल तो भर गया, दर्द से, उनका आज भी खाली है.
घूमती हैं जिसे थाम के बाजार में, तरसती हैं की कभी साथ में खा लें,
इधर मेरी भी थाली अकेली है, उधर उनकी भी थाली अकेली है.
परमीत सिंह धुरंधर
नजरो से सियासत होती है,
अक़्ल तो बजीर रखते हैं.
जुदाई का नाम है मोहब्बत,
जोड़े वाले तो बस तकदीर रखते हैं.
परमीत सिंह धुरंधर
रहनुमाओं की भीड़ थी और मैं लूट गया,
ये ही तो उनकी अदा थी हर शख्श मुख मोड़ गया.
जरा सी नाकामयाबी रिश्ते समझा देती है,
कीमत कम हुई मेरी बाज़ार में और वो सौदा बदल गया.
परमीत सिंह धुरंधर
दीवानों की बस्ती अब कहाँ मिलती है,
अब तो सितारों का चमन है.
तुम जिसे मोहब्बत बता के इतरा रहे हो इतना,
जरा गौर से देखो उसमे कितने पैबंद हैं.
आँखों में काजल लगा के दिल चुरा ले मेरे,
ऐसा चेहरा आज तक ढूंढ रहा हूँ.
जो भी मिलते हैं इन राहों में,
उनके तो गालों, हाथों,
हर अंग पे लगा कुछ- न- कुछ है.
मैं कितना भी कहूँ अपनी सच्चाई,
उनकी अदा के सामने तो सब जूठ है.
परमीत सिंह धुरंधर
बचपन के शौक जवानी को दुःख देते हैं,
और जवानी की मौज़ बुढ़ापे को रुला देती है.
कोई क्या सितम ढायेगा मुझपे,
जिसकी औलाद ही उसे गैर बता देती है.
मोहब्बत का शौक लेकर चला था,
हाथों में गुलाब लेकर चला था.
अंदाजा नहीं था जमाने के नए रूप का,
जहाँ फ्रेंडशिप ही अब सबकुछ बिकवा देती है.
क्या किस्सा सुनोगे दोस्तों, उनकी डोली उठने के बाद,
अब तो जवानी भी बुढ़ापे का एहसास देती है.
इतना तरसने के बाद भोजन का क्या,
ऐसा खाना अब भूख और बढ़ा देती है.
मुझसे मिलने आते हो तो मेरा पता मत पूछ,
मेरे नाकामयाबी, घर आने वाली हर राह में दिए जल देती है.
परमीत सिंह धुरंधर