नया दौर


ये दुश्मनी का नया दौर है,
मोहब्बत में इलज़ाम लगाना,
अब शौक है.
कल तक रोती थीं जो मेरी,
पहलु में आने को.
आज मेरी पहलु से जाने,
को बेताब हैं.
एक रात के लिए जो,
अब्बा-अम्मा से लड़ गयी.
एक रात भी अब नहीं गुज़ारेंगी,
ये कह के मुख मोड़ गयीं.
ये वक्त का नया दौर है,
हर रात एक नया शौक है.
बहती गंगा में कौन नहीं हाथ धोता,
आज हुश्न से बड़ा गंगा कौन है.
ये अंदाजे-रुख का नया दौर है,
सबको फ्रेंडशिप का शौक है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

पालनहार


माँ का कोई रूप नहीं,
माँ का कोई रंग नहीं.
माँ तो दिव्य है,
माँ साक्षात ब्रह्म है.
माँ ही ओमकार है,
माँ ही निराकार है.
धरती पर माँ,
भागवत का रूप साकार है.
विश्व का आधार,
धर्म का श्रृंगार,
माँ प्रेम का सास्वत,
भण्डार है.
संस्कृति माँ से, माँ ही ज्ञान,
स्वयं नतमष्तक है भगवान,
सृष्टि का माँ ही,
पालनहार है.

परमीत सिंह धुरंधर

हया


वो आज भी,
निगाहों में हया रखती हैं,
बस मोहब्बत में ही बेहया हैं.
तरप उठती हैं,
गोरैया के जख्म देख कर,
बस आशिक़क़ों की,
मौत की दुआ रखती हैं.
न जाने क्यों पूजते हैं,
दुनिया वाले देवी कहकर,
वो जो सीने में अब भी,
वासना और फरेब रखती हैं.

परमीत सिंह धुरंधर

धर्म


बात – बात में खून बहाते हो,
चाँद लकीरों के नाम पे.
मेरा तो धर्म, मजहब, ईमान,
सब वहाँ है,
जहाँ वो अपने केसुओं को बिछा दें.
सबसे बड़ा धर्म माँ की गोद,
सबसे बड़ी इबादत,
महबूब की आगोश है.
इसके मिलने पे,
जन्नत-जहन्नुम का भेद मिट जाता है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

खूबसूरत ह्रदय


खूबसूरत है जो ह्रदय,
वो सजता-सवरता ही नही.
सजने-सवरने वालों में,
कोई ह्रदय ही नहीं.
मैं कल भी चूड़ी लाया था,
मैं आज भी कंगन लाया हूँ.
आइना भी इंतज़ार में बैठा है,
चूल्हा है की भुझता ही नहीं.
सुबह थक कर चली गयी,
रात ऊब कर ढल गयी.
गजरा भी अब सुख गया,
बेलन-चौकी उनकी थकती ही नही.

परमीत सिंह धुरंधर

बुढऊ


सर में ना एको बाल,
ना आँख में बा जोति।
फिर भी बुढऊ ढुढ़े लें,
कोई एगो, पकावे ल रोटी।

परमीत सिंह धुरंधर

मोहब्बत


सुबह में देखि सीरत,
शाम को देखि सूरत.
बदले- बदले से,
दोनों लगे.
तब जाके समझी
कीमत.
सुख-दुःख में साथ देने का,
मीठा बोल बोलके.
जब जेब हुई खली,
सेज ही वो बेच गए.
अमीरी में देखि सोहरत,
गरीबी में देखि जिल्लत,
बदले – बदले से,
दोनों लगे.
तब समझी,
उनकी मोहब्बत.

परमीत सिंह धुरंधर

उन्हें बेवफा मत कहो


उन्हें बेवफा मत कहो,
शुक्र है की वो किसी की तो हो गयी.
सीरत से न सही, सूरत से तो हो गयी.
बाढ़ में डूब जाते हैं कितने ही किनारें,
क्या हुआ?
जो कुछ वो भी डूबा गयीं.
दिल से न सही, जिस्म से तो हो गयीं.
उन्हें बेवफा मत कहो,
शुक्र है की वो किसी की तो हो गयी.
कैसे काटे कोई जीवन, किसी एक के साथ,
इसलिए,
किसी को निगाहें, किसी को अपने होठ दे गयी.
उन्हें बेवफा मत कहो,
शुक्र है की वो किसी की तो हो गयी.

परमीत सिंह धुरंधर

काफ़िर और ताज


सुबह के इंतज़ार में रात भर बैठे रहें,
काफ़िर ये नहीं तो कौन है?
जो एक दिया तक नहीं जला पाएं.
इनसे अच्छे तो वो हैं,
झूठा ही सही, कुछ ख़्वाब तो देखते हैं.
एक की मोहब्बत में, ताज बना गए,
अरे काफ़िर ये नहीं तो कौन है?
जो कितनों का पेट कुचल गए.
ऐसी मोहब्बत किस काम की?
उनकी जुल्फों का शौक किस काम का?
वो बदलती है गजरा,
अपने हर रात की शौक में,
अरे काफ़िर ये नहीं तो कौन है?
जो कितने भौरों को मार गए.

परमीत सिंह धुरंधर

कालेज में एक नया चेहरा


कालेज में एक नया चेहरा,
मजनुओं के महफिल में,
जोश जगा गया.
जो मिट गए मोहब्बत में,
वो किसी काम के नहीं.
पर इन बचे हुए, दबे, हारे,
कुचलों के मन में,
इंकलाब जगा गया.
कुछ खास नहीं,
बस एक दुप्पट्टे में हैं,
इस उजड़ी हुई बस्ती में,
एक चाँद सी हैं.
की एक,
चलना ही देख कर उनकी,
बहक रहे हैं यहाँ सभी,
एक झलक उनकी,
कब्र में जाने से पहले,
जन्नत दिखा गया.
अब साजिस रची जाएंगी,
किस्से गढ़े जाएंगे,
जीते-जश्न, गमे-हार,
के दौर भी आएंगे।
मगर, उदास चेहरों,
बुझती जवानी,
इन अँधेरी रातों में,
कोई फिर से आज,
सुनहरे भविष्य और,
मीठे ख़्वाबों का,
एक दिया जला गया.

 

परमीत सिंह धुरंधर