बढ़ा चल-बढ़ा चल


दर्द ही अगर जिंदगी है तो मोहब्बत खुले आम कर,
शौक ही अगर तेरा यह ही है तो बेवफाई का न गम कर.
हौसले अगर पस्त ना हुए हो तेरे तो बढ़ा चल, बढ़ा चल,
वो किसी और की डगर तू एक नयी थाम कर.
खूबसूरत चेहरे चाँद से और आँचल उनका बादल सा,
बरस गए तो किस्मत तेरी वरना नए मानसून का इंतज़ार कर.
शहीद हुए कितने इन राहों में कौन आंसू बहता है,
मौत से जो निर्भय है वो ही हुस्न से दिल लगता है.
बेवफाओं की इस बस्ती में कितने उजड़ गए,
किस -किस का जिक्र करें और कहाँ -कहाँ करें।
तू अपनी सोच, मंजिल पे नज़र रख, बढ़ा चल-बढ़ा चल,
वो किसी और की डगर तू एक नयी थाम कर.

 

परमीत सिंह धुरंधर

मोहब्बत


तेरी मोहब्बत में क्या लिखे,
हो भी लिखता हूँ मिट जाता है.
मैं तो खुद डूबा हुआ हूँ,
दूसरों को यहाँ क्या बचाएं।

परमीत सिंह धुरंधर

शौक


अब कहाँ चलती है गोलियाँ मोहब्बत में,
हमें तो शौक है अब उनकी गालियों का.
आज भी जब गुजरता हूँ उनकी गलियों से,
तो भर जाती हैं मेरी झोलियाँ।

 

परमीत सिंह धुरंधर

मोहब्बत


बुलंदियों का इतना है शौक मुझे,
की समझ नहीं पाया मोहब्बत को.
कभी-कभी तो वो मिलती थीं,
मैं सुनाने लगता था अपनी शोहरत को.

परमीत सिंह धुरंधर

माँ


पर्वतो के पास हैं हज़ारों नदियाँ,
वृक्षों के पास है लाखो शाखाएं।
मेरी माँ का एक मैं ही हूँ सहारा,
तो कैसे तोड़ दूँ उसकी आशाएं।
रात के पास है चाँद-तारे,
दिन को मिला सूरज की निगाहें।
माँ की उम्मीद सिर्फ मैं हूँ,
तो कैसे तोड़ दूँ उसकी आशाएं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

शौक


अब कहाँ चलती है गोलियाँ मोहब्बत में,
हमें तो शौक है अब उनकी गालियों का.

 

परमीत सिंह धुरंधर

प्यास


तुम्हें दर्जनो की मोहब्बत मिले,
मैं यूँ ही प्यासा भटकता रहूँ।
तुम्हें चाँद-तारों की रोसनी मिले,
मैं यूँ ही अंधेरों में जाता रहूँ।
मेरी मोहब्बत ही सच्ची थी,
पर मैं सोना-चांदी नहीं ला सका।
तुम्हें सोहरत मिले, तुम्हें दौलत मिले,
मैं यूँ ही फकीरी में तेरी चित्र बनता रहूँ।
तमन्ना थी की आँखों का काजल बनूँ,
जुल्फों का गजरा, होठों की लाली बनूँ।
तेरा सौंदर्य सदा सबकी प्यास जगाता रहे,
मैं यूँ ही आँसुंओं से प्यास मिटाता रहूँ।

 

परमीत सिंह धुरंधर

दिल के कच्चे


मत पूछो,
मेरी जवानी के किस्से,
मोहल्ले के सारे अपने,
ही बच्चे हैं।
क्या हुआ,
जो कहते हैं,
हमें वो चाचा.
कमबख्त,
खून के ये रिश्ते,
ऐसे ही,
अच्छे हैं.
महफूज है मेरी बाहों में,
आकर ये.
ये इनकी माँ भी जानती हैं,
की हम आज भी,
दिल के कच्चे हैं.
दर्द तब होता है,
जब वो कहती हैं, मियां,
और तुरंत कहती हैं,
अलबिदा।
मुस्काती हैं ये सोचकर,
की हम आज भी उनके,
धागे से बंधें हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

नज़र


उनके नज़र से नज़ाकत ऐसे खो गयी,
रूह मेरी थी वो क़यामत ढा गयी.
रुख ऐसे मोड़ा की क्या बताऊँ,
दिन में ही मुझे चाँद-तारे दिखा गयी.
मोहब्बत की अब नहीं है कोई तमन्ना,
वो एक रात ऐसे अपने होठों से पीला गयीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

प्यासा


लो,
दर्द के अपने कुछ किस्से,
आज तुम्हे भी सुना दूँ.
जो कुछ मीठा है मेरे पास,
आज तुम्हे भी चखा दूँ.
मुझे अब भूख नहीं लगती,
और तुम आज भी भूखे हो.
तो लो,
बैठो।
अपनी थाली में से कुछ,
आज तुम्हे भी खिला दूँ.
खा लो,
पर अब पानी मत माँगना.
वो मेरे पास मीठा नहीं,
खरा है.
तुम प्यास मिटाने के लिए जी रहे,
मैं प्यासा ही जी रहा हूँ.
की उसे पी कर,
मैं आज तक,
प्यासा ही जी रहा हूँ,
प्यासा ही जी रहा हूँ.

 

परमीत सिंह धुरंधर