बिहार और उत्तर प्रदेश


हम वो हैं जिसको चुना है देवों ने,
हम तो वो हैं जिसको सहा है देवों ने.
जब ग्रसित हुईं अभिमान से इंदिरा,
तो एक बृद्ध चला था जगाने गावं -गांव को.
हंस रहा था जब पूरा उत्तर प्रदेश उस पर,
तब सहारा दिया था बिहार के नौजवानों ने.
ज्ञान में हमने दिया मिथिलांचल,
शान उसकी क्या सहेगा कोई पूर्वांचल?
शंकराचार्य को परास्त किया था इसी आँगन में,
गांधी को भी दिया था हमने अभिमान इसी चम्पारण में.
जब उतरने को थी धरती पे गंगा,
बोली, इसी बिहार से जाउंगी।
जानकी भी बोली राम से, तभी बनूँगी आपकी,
जब डोली मिथिला से जायेगी।
दिनकर की आवाज यही से, नागार्जुन का तेवर यही से,
राजेंद्र प्रसाद से चंद्रशेखर,
हर बगावत की शुरुआत यही से.
बुद्ध, महावीर, गुरु गोबिंद यही के,
फिर किस पे इतना दम्भ तुम्हे?
चन्द्रगुप्त, आज़ाद शत्रु, अशोक यही के,
इतहास से वर्तमान तक कोई नहीं है हमसे आगे.
बिहार को तुच्छ समझने वालों,
तुच्छता का प्रमाण यही ही,
की हर वार पड़ी है धर्म की नीवं यही पे.

 

परमीत सिंह धुरंधर

आलू – बैंगन – कांदा


दो – चार किलो दही,
दो – चार किलो आंटा।
आ बसा लें गृहस्ती,
तू लम्बी, मैं नाटा।
तुम्हे सैंडल भी दिलाऊंगा,
तुम्हे गहने भी पहनाउंगा।
लेकिन पहले सम्भालो आके,
मेरा चूल्हा – चौकी – चाका,
तू लम्बी, मैं नाटा।
दो – चार किलो दही,
दो – चार किलो आंटा।
आ बसा लें गृहस्ती,
तू लम्बी, मैं नाटा।
तेरे ओठों से लगा के,
हर रंग चखूँगा.
तेरी जुल्फों से बांध के हर,
खवाब रखूँगा।
लेकिन पहले सीख ले चलाना,
बेलन – छुरी -काँटा,
तू लम्बी, मैं नाटा।
दो – चार किलो दही,
दो – चार किलो आंटा।
आ बसा लें गृहस्ती,
तू लम्बी, मैं नाटा।
तुझे दिल्ली भी घुमाऊंगा,
तुझे पिक्चर भी दिखाऊंगा।
लेकिन पहले सीख ले बनाना,
आलू – बैंगन – कांदा,
तू लम्बी, मैं नाटा।
दो – चार किलो दही,
दो – चार किलो आंटा।
आ बसा लें गृहस्ती,
तू लम्बी, मैं नाटा।

 

परमीत सिंह धुरंधर

लाड़ली


बाबुल तुझसे दूर जा रही है,
तेरी लाड़ली अनजान बनके।
नए धागों में ही बांधना था,
तो क्यों संभाला था दिल में?
अपनी जान बोलके।
मैं हंसती थी, तो तुम हँसते थे.
मैं रोती थी, तो तुम रोते थे.
रिश्ता था अगर वो सच्चा,
तो क्यों बाँट दिया आँगन?
मुझे अपना सौभाग्य बोलके।
अब किससे दिवाली पे तकरार होगी?
रूठ कर किसपे प्रहार करुँगी?
याद आवोगे जब इन आंशुओं में,
तो किसके सीने से दौड़ के लगूंगी?
अगर मैं हूँ खून तुम्हारा,
तो क्यों सौंप रहे हो गैरों को?
अपनी शान बोलके।

 

परमीत सिंह धुरंधर

किसी को सताते थे हम भी तो


जिंदगी के कुछ पल ही सही,
मशहूर हुए थे हम भी तो.
वो पल भी कितना न्यारा था,
करीब थे किसी के हम भी तो.
ऐसी कोई शाम नहीं गुजरती थी,
जब वो घुघंट न करती थीं.
वो पल भी कितना प्यारा था,
घुघंट उठाते थे हम भी तो.
उनके चहकने, चहचहाने से,
सुन्दर थी ये बगिया भी.
वो पल भी कितना अपना था,
किसी को सताते थे हम भी तो.

 

परमीत सिंह धुरंधर

हमारी बेगम -जान हो


बेगम – जान हो, हमारी तुम बेगम -जान हो,
हम हैं सुखल छुहारा तुम पहलवान हो.
खाती हो, खिलाती हो, धौंस भी दिखती हो,
बीस बरस की शादी के बाद भी,
सोलह सी सरमाती हो.
दो बच्चों की अम्मा,
तुम अब भी बड़ी नखरेबाज हो.
बेगम – जान हो, हमारी तुम बेगम -जान हो.
हम हैं सुखल छुहारा तुम पहलवान हो.

मन की सच्ची हो, कान की कच्ची,
पुरे मोहल्ले की सहेली हो तुम पक्की।
पल में हवा में महल बना देती हो,
बात – बात में मायके का करती गुमान हो.
दो लड़कियों की अम्मा तुम अब भी कच्ची -कचनार हो.
बेगम – जान हो, हमारी तुम बेगम -जान हो.
हम हैं सुखल छुहारा तुम पहलवान हो.

 

परमीत सिंह धुरंधर

गजानन स्वामी मेरे


गजानन – गजानन, प्रभु मेरे,
मुझ पर भी दया दृष्टि करो.
मुश्किलों में है सारी राहें मेरी,
हे विध्नहर्ता, इन्हे निष्कंटक करो.
ज्ञान के आप हो अथाह – सागर,
दिव्य ललाट और विशाल – नयन.
अपने नेत्र-ज्योति से मेरे जीवन में प्रकाश करो.
गजानन – गजानन, स्वामी मेरे,
मेरे मन-मस्तिक में विश्राम करो.
अपमानित हूँ, दलित हूँ,
जग के अट्ठहास से जड़ित हूँ.
आप प्रथम -पूज्य, आप सुभकर्ता,
महादेव – पार्वती के लाडले नंदन।
मेरे मस्तक पे अपना हाथ रखों।
गजानन – गजानन, स्वामी मेरे,
इस अपने सेवक का भी मान रखो.

 

परमीत सिंह धुरंधर

एक तो हम बिहारी है


एक तो हम बिहारी है,
उसपे हम सीधे बिहार से.
जिला हैं मेरा छपरा,
जहाँ लालू के ससुराल रे.
जहाँ से भइलन भिखारी,
जेकर मारिसस तक रहल तान रे.
माटी यही है राजेंद्र बाबू जी का,
जिन्होंने सवारा था भारत का ललाट रे.
एक तो हम बिहारी है,
उसपे हम सीधे बिहार से.
जिला हैं मेरा छपरा,
जहाँ लालू के ससुराल रे.
काट देते हैं, छाँट देते हैं,
जहाँ निकल जाती है गोली,
बात -बात पे.
जो नहीं अपने,
उनको तो देते हैं हम रगड़ के.
और जो हैं अपने मेरे,
हम रखते हैं उनको भी रगड़ के.
एक तो हम बिहारी है,
उसपे हम सीधे बिहार से.
जिला हैं मेरा छपरा,
जहाँ लालू के ससुराल रे.

 

परमीत सिंह धुरंधर

बिहार के दोनों लाल ऐसे


एक का नाम Aftab है,
और एक का नाम Crassa.
बिहार के दोनों लाल ऐसे,
कहीं भी जमा दें तमाशा।

एक का नाम Vipul है,
और एक का नाम Raman.
बिहार के दोनों लाल ऐसे,
साथ चलें तो जैसे नर-नारायण।

एक का नाम Rajesh Prasad है,
और एक का नाम Vimal Kishor।
बिहार के दोनों लाल ऐसे,
छाँट दे अँधेरा और कर दे भोर.

 

परमीत सिंह धुरंधर

बेगम – जान


आवsअ दिल के दिल से करार करके,
तहरा के बेगम – जान कह दीं.
तू पीसsअ सरसो हमार सिलवट पे,
हम घर-दुआर सब तहरा ही नाम कर दीं.
जहिया से देखनी रूप तहार पनघट पे,
प्यास उठल बा अइसन इह मन में,
की मन करे पनघट पे ही घर कर दीं.
आवsअ तहरा अधर-से-अधर जोड़ के,
तहके आज आपन प्राण -प्यारी कह दीं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

वफ़ा


उम्र गुजर जाए तेरी बाहों में,
फिर मुझे मेरी मौत का गम नहीं।
एक रात दे दे, वफ़ा की सच्ची में,
फिर तेरी वेवफाई का मुझे रंज नहीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर