I love to give my model,
Because I love dreaming,
And, not just the cultivation.
So give me, give me a break,
If you want to crack the nut,
And don’t want just the flavor.
Parmit Singh Dhurandhar
I love to give my model,
Because I love dreaming,
And, not just the cultivation.
So give me, give me a break,
If you want to crack the nut,
And don’t want just the flavor.
Parmit Singh Dhurandhar
तहार चोलिया के तोड़ के बटन रानी,
आज कहबू त हो जाइ खुले – आम रानी।
ऐसे भी जानअ ता सारा ई जवार रानी,
तहार चोलिये में फँसल बा हमार जान रानी।
परमीत सिंह धुरंधर
अगर जीवन है एक संग्राम,
तो मेरे पिता हैं शालिग्राम।
जाने वो कौन सा एक पुण्य था,
जो मुझको मिला ये धाम.
कोई त्रिस्कार, कोई पुरस्कार,
अब मायने नहीं रखता।
इस रक्त से प्रवाहित मस्तक पे,
अब कोई और ताज नहीं शोभता।
अगर साँसों का होना है,
ब्रह्म के होने का प्रत्यक्ष प्रमाण,
तो मेरे पिता हैं उन वेदों का समस्त ज्ञान।
परमीत सिंह धुरंधर
मेरे पिता,
प्रेम था आपसे इतना,
की मैं विषपान कर लेता।
कलयुग है ये, वरना मैं भी,
महाकाल से टकराता।
मेरे दुखों को मिटाने को,
पिता ने जीवन बिता दिया।
मेरे मुस्कराहट को प्रज्जवलित रखने को,
जिसने जग से ठान लिया।
मेरे पिता,
मैं कमजोर निकला,
कुछ कर ना सका.
कलयुग है, वरना मैं भी,
कुरुक्षेत्र सजा देता।
महाकाल से, अपनी साँसों से,
आपका जीवन बदल लेता।
परमीत सिंह धुरंधर
यारो मैं प्यार करूँगा उस लड़की की बाहों में,
जिसके सपनों में बस हम हों,
और कोई ना हो उन आँखों में.
मेरा इंतजार जो करती हो चूल्हे और चौखट के बीच में,
चैन ना हो, जब तक आवाज घुंघरू की मेरे बैलों के,
पड़ ना जाये उन कानों में.
यारों मैं अंक भरूंगा उस लड़की के अंगों से,
जिसके सपनों में बस हम हों,
और कोई ना हो उन आँखों में.
जो बिना मुझे खिलाएं, ना खाये एक अन्न का भी दाना,
बिना मेरे मुस्कान के, ना खनके पायल जिसके पावों में.
यारों मैं तो रंग डालूंगा उस लड़की के वक्षों पे,
जिसके सपनों में बस हम हों,
और कोई ना हो उन आँखों में.
परमीत सिंह धुरंधर
तनी धीरे -धीरे, तनी धीरे -धीरे,
दौड़ाई ई टमटम राजा जी,
हचका मारे,
त अ दुखे कमरिया राजा जी.
ऐसे जोश में ना होश गवाईं राजा जी.
चूड़ी टूटल, केसिया खुलल,
अब का साड़ी खोलेम राजा जी?
तनी लोक-लाज,
शरम कुछु त अ बचाईं राजा जी.
तनी धीरे -धीरे, तनी धीरे -धीरे,
दौड़ाई ई टमटम राजा जी,
हचका मारे,
त अ दुखे कमरिया राजा जी.
पोरे -पोरे देहिया के तुड़ के रखनी,
कहिया समझेम,
इ शरीरिया भी ह हाड़ -माँस राजा जी?
तनी बैठे ना दीं,
फुरसत में दुगो घड़ी राजा जी.
तनी धीरे -धीरे, तनी धीरे -धीरे,
दौड़ाई ई टमटम राजा जी,
हचका मारे,
त अ दुखे कमरिया राजा जी.
जाने माई का -का समझा के भेजली,
रउरा आगे कउनो उपाय ना बाचल राजा जी.
तनी देहिया पे रहेदी साड़ी राजा जी.
तनी धीरे -धीरे, तनी धीरे -धीरे,
दौड़ाई ई टमटम राजा जी,
हचका मारे,
त अ दुखे कमरिया राजा जी.
छोड़ी अब गइल छपरा और सिवान,
अँगना में रहीं आ खाईं गरम-गरम राजा जी.
तनी हमरों के लुटे दी जवानी राजा जी.
तनी धीरे -धीरे, तनी धीरे -धीरे,
दौड़ाई ई टमटम राजा जी,
हचका मारे,
त अ दुखे कमरिया राजा जी.
परमीत सिंह धुरंधर
मैं अंदाज बदल दूंगा,
परिणाम बदल दूंगा।
होगा अगर कोई रण यहाँ,
तो धरती क्या?
मैं आसमान बदल दूंगा।
क्यों चिंतित हो पिता?
तात श्री के ज्ञान से.
अगर राम, नारायण भी हैं तो,
मैं अपनी तीरों से त्रिलोक बदल दूंगा।
मैं यूँ ही इंद्रजीत नहीं,
मुझे त्रिलोक के सुख की चाह नहीं।
बस आपके जय-जयकार के लिए,
पिता श्री,
मैं सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड बदल दूंगा।
परमीत सिंह धुरंधर
जब से भए तुम बालम जी परदेसिया,
प्यासी – प्यासी मैं, प्यासी रे अचरिया।
मेघ बरसे, माटी भींगें, सोंधी रे महक,
बिन तेरे बालम जी, अंग -अंग भारी और प्रबल।
जब से भए तुम बालम जी परदेसिया,
प्यासी – प्यासी मैं, प्यासी रे अचरिया।
चुहानी बैठूं, जांत चलाउन, मुसल चलाउन,
कहाँ मिटती हैं फिर भी तन – मन की थकन.
जब से भए तुम बालम जी परदेसिया,
प्यासी – प्यासी मैं, प्यासी रे अचरिया।
कलियाँ खिलीं, भ्रमर गूंजे, आयी रे सावन,
बिन तेरे बालम जी, मेरे वक्ष ही हुए मेरे सौतन।
जब से भए तुम बालम जी परदेसिया,
प्यासी – प्यासी मैं, प्यासी रे अचरिया।
परमीत सिंह धुरंधर
Some relationships give memories,
And some gives a meaning to the life.
It is just that,
I want my share before I die.
Neither money nor success,
Nothing can make me cry.
It is just that,
I want my share before I die.
Parmit Singh Dhurandhar
पिता की मौत के बाद,
मैंने घर को तितर -बितर कर दिया।
जाने क्या ढूंढ रहा था?
घर वाले परेशान,
बड़ा भाई पागल हो गया है क्या?
सबके आँखों में सवाल,
लेकिन सब खामोश।
लेकिन मेरा अंतर्मन, जानता था मेरी लालच को,
वो पहचानता था मेरे अंदर के बईमान इंसान को.
मैं वो खजाना जल्द -से -जल्द,
प्राप्त करना चाहता था.
जिसके बल में मेरे पिता ने,
शान-ओ-सौकत की जिंदगी मुझे दी थी.
जिसके बल पे मैंने पुणे विद्यापीठ और,
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में,
अमीरी के अहंकार को जिया था.
जिस पिता के खजाने को मैंने,
लड़कियों के आगे -पीछे,
उनके हुस्न पे लुटाया था.
जिद, अहंकार या राजपूती शान के सारे,
मेरे अपने गढ़े तमगे,
जो मैं शान से ढोता था.
सच्चाई है की वो मेरे ना परिश्रम का फल था,
ना मेरे पौरुष की कहानी।
मैंने सिर्फ और सिर्फ अपने पिता के मेहनत और संचय,
को अपने अहम् का ढाल बनाया था.
पसीने से लथ-पथ जब मैंने एक कोने में सर पकड़ लिया,
माँ ने आँचल से पोंछते हुए पूछा, “क्या ढूंढ रहे हो बेटा?”
मेरे कहने पे की पैसे या कोई कागज बैंक का,
माँ उठी, और एक पोटली उसकी साड़ी की बनी,
लाकर मेरे आगे रख दिया, “बस यही है बेटा।”
एक भूखे भेड़िये सा मैं उस पोटली पे टूट पड़ा,
लेकिन उसके खुलते ही मेरे अंदर तक अँधेरा छा गया.
सेवा-निविर्ती का पत्र और उनकी आखिरी तनखाह,
और इसी पे उन्होंने आठ लोगो को ऐसे पोसा,
जैसे कोहिनूर हो संदूक में.
उस दिन मैं गरीब हो गया,
उस दिन मेरा अहंकार मुझपे हंस रहा था.
एक पिता ने एक तिलिश्म बना के रखा था,
जो उस दिन ढह गया.
परमीत सिंह धुरंधर