पत्नी


गले – से – गले मिलके,
तुमने संभाला है ओठों को.
वरना हम तो बहक ही चुके थे,
देख, शहर में मयखाने को.
मिलती है अनगिनित परियाँ,
रोज, मेरी रात बसाने को.
तुम ना होते तो बिक ही जाते,
आँचल उनका सजाने को.
कई साल बीते, यूँ ही,
एक ही साड़ी पहने- पहनते.
और हर मास, मुझे नया,
सूट तुम सिलवाती हो.
ये तुम ही हो जिसने बचाईं है,
दीवारें मेरे घर की.
पर दुनिया भर में कहती हो,
नाम मेरा, अहम मेरा बचाने को.
बाहों – में – बाहें डालकर,
तुमने ही बचाया है जीवन को.
वरना हम तो मिट चुके थे,
कब का, खाते – खाते राहों में ठोकरों को.

परमीत सिंह धुरंधर

बकलोल बैल


बैल, सैया हमार,
बकलोल रे.
सखी हमार भाग,
फुटल मिलल रे.
लाख मन के योवन,
चोलिये में रह गइल.
सैया बथान में,
पुआल देखे रे.
देवरानी दही पे,
रोज छाली चखे.
नन्दी घूम-घूम के,
गावं में दावँ मारे रे.
जलअता योवन हमार,
चूल्हे की आंच पे.
सैया दुआर पे,
तास खेले रे.
सखी हमार भाग,
फुटल मिलल रे.

परमीत सिंह धुरंधर

नैहर के चोर


गली – गली में शोर बालम जी,
धरती पे एगो चोर बा.
लूट अ ता रोज हमर खजाना,
अइसन उ मुँहजोर बा.
हमरा रहते ये रानी,
केकर तहरा पे जोर बा.
हमरा त लॉग अ ता,
की तहरे मन में कउनौ चोर बा.
चल जा तानी रोजे बथानी,
हमरा के अकेले छोड़ के.
आव अ ता आधी रात के,
दे ता देहिया झकझोड़ हाँ.
गली – गली में शोर बालम जी,
धरती पे एगो चोर बा.
लूट अ ता रोज हमर खजाना,
अइसन उ मुँहजोर बा.
काहे ना चिल्लाइलु तू,
आवाज देहलू बढ़ के.
हमरा त लॉग अ ता रानी,
तहरा भाइल ई चोर बा.
मुँहवा दबले रहल हमार,
अंगिया पे रखले रहल धार हाँ.
चूड़ी तुरलख, कंगन छिनलख,
ले गइल नथुनिया तोड़ हाँ.
गली – गली में शोर बालम जी,
धरती पे एगो चोर बा.
लूट अ ता रोज हमर खजाना,
अइसन उ मुँहजोर बा.
हमरा त लॉग अ ता रानी,
तहरा नैहर के कउनौ जोड़ हाँ.
गली – गली में शोर बालम जी,
धरती पे एगो चोर बा.
लूट अ ता रोज हमर खजाना,
अइसन उ मुँहजोर बा.
हमरा रहते ये रानी,
केकर तहरा पे जोर बा.
हमरा त लॉग अ ता,
की तहरे मन में कउनौ चोर बा.

परमीत सिंह धुरंधर

बीमार – सास


पायल छनकअता रात- रात भर,
बालम अइसन बा तहार ई प्यार।
टूट गइल शर्म के सारा दीवार,
बालम अइसन बा तहार ई प्यार।
मायका से आईल बा चिठ्ठी,
घरे बुलावाव तारी माई।
लिखदअ बालम तनी ई जवाब,
बीमार बारी सास हमार।
बालम अइसन बा तहार ई प्यार।
पायल छनकअता रात- रात भर,
बालम अइसन बा तहार ई प्यार।
टूट गइल शर्म के सारा दीवार,
बालम अइसन बा तहार ई प्यार।

परमीत सिंह धुरंधर

हुकूमत


चमक को छोड़ दो,
हल्दी पीसने पर ही हैं निखरती.
सास सीधी हो या हो गूंगी,
बहु को हमेसा है अखरती.
ये लड़ाई है हुकूमत की,
चाहे आँगन हो या हो दिल्ली.

परमीत सिंह धुरंधर

निराला सैयां


हमर सैयां बारन बड़ा निराला,
जतना खालन मीठा ओतने तीखा।

परमीत सिंह धुरंधर

सैयां के हाल


सुबह होते कहलन सैयां,
अंखिया में काजल लगावेला।
रतिया में सैयां खुदे,
सारा काजल चुरा लेहलन।
का कहीं सखी,
आपन सैयां के हाल,
दिनवा में पहनाके सब सोना-चाँदी,
रतिया में देहिया से झार लेहलन।

परमीत सिंह धुरंधर

थाती


रतिया तहरे से हाथ लड़ा के,
चूड़ी-कंगन, हँसुली हेरइली।
अइसन जीत के का करीं,
जब अकेले हम हीं आपन थाती लुटाइली।

परमीत सिंह धुरंधर

राजा जी


सैयां तहरे जवानी के किस्सा रहल,
जो कचहरी में चलल रहल.
पंच-प्रमुख भी का करियन तहरा के,
उनकरो घरे त ताहर काँटा फसल रहल.
बड़ा कइलअ तू मनमानी राजा जी,
गाउँवा में सबके बनइलअ तू नानी राजा जी.
छोड़अ अब ई सब धंधा हमरो पर धयान द राजा जी,
अब संभालअ तू आपन घर और दुआर राजा जी.

परमीत सिंह धुरंधर

अगस्त 22


प्रेम में ये पहला पत्र लिखा है,
प्रिये तुम्हे मैंने अपना प्राण लिखा है.
शब्द मत समझना इन्हे कलम के,
मैंने साक्षात इसमें अपना ह्रदय रखा है.
तुम्हारी कमर पे हरपल झूलती,
वो चोटी मेरे ह्रदय की वीणा हैं.
जिसे मैंने तुमसे दूर इस शहर में,
अब तक हर एक पल में झंकृत रखा है.
प्रेम में ये पहला पत्र लिखा है,
प्रिये तुम्हे मैंने अपना प्राण लिखा है.
हर सुबह,
तुम्हारी केसुओं से जो छनती थी बुँदे,
मैंने उसे, विरहा के इस तपते रेगिस्तान में भी,
अपनी पलकों में संजोये रखा हैं.
प्रेम में ये पहला पत्र लिखा है,
प्रिये तुम्हे मैंने अपना प्राण लिखा है.
सब कुछ निपटा के, हर दीपक बुझा के,
जब तुम कमरे में आती थी एक दिया जला के,
मैंने आज तक, जीवन के हर निराशा में,
असफलता में, उसकी लौ को अपने सीने में,
प्रज्जवलित रखा है।
प्रेम में ये पहला पत्र लिखा है,
प्रिये तुम्हे मैंने अपना प्राण लिखा है.

 

परमीत सिंह धुरंधर