वीरांगना का सुहाग


चौहानों का इतिहास हम फिर से लिखेंगे
हम नहीं चुनेंगे उन्हें, वो हमें चुनेंगें।
पिता के सामने जो पति मान ले
उस वीरांगना का सुहाग बन हम चमकेंगे।

परमीत सिंह धुरंधर 

बिहार अपनी बूढी माई रे


हम ना हिन्दू, ना मुस्लिम
ना हम सिक्ख ना हम ईसाई रे.
हम हैं बिहारी रे बंधू
बिहार अपनी बूढी माई रे.
छपरा जिसका ह्रदय
जहाँ बहती है पुरवाई रे.
और गंगा जिस धरती पे
लेती है, बलखा – बलखा अंगराई रे.

हम जाए चाहे जहाँ
यादों में बस उसकी ही परछाई रे.
सारी दुनिया घूम ले हम चाहे
चाहे जितनी भी हो कमाई रे.
खाते हैं हम लिट्टी-चोखा
डाल के उसपे मलाई रे.
हम हैं बिहारी रे बंधू
बिहार अपनी बूढी माई रे.

परमीत सिंह धुरंधर 

जो तू जुल्फों में सुलाए रे


तेरे दो नैना गोरी, चाँद को ललचाये रे
कैसे थामें दिल धुरंधर, जब कमर तेरी बलखाये रे?
छोड़ दूँ छपरा, छोड़ दू कचहरी
डाल दूँ खटिया आँगन में
जो तू जुल्फों में सुलाए रे.

डाल के कजरा, छनका के पायल
जवानी के आग में, तू छपरा को झुलसाए रे.
लहरा – लहरा के तेरा आँचल, बादल को पागल बनाये रे.
छोड़ दूँ छपरा, छोड़ दू कचहरी
डाल दूँ खटिया आँगन में
जो तू जुल्फों में सुलाए रे.

परमीत सिंह धुरंधर 

सीधा सा


रात का नशा है तनहा – तनहा
किसे पुकारें, दर्द है ये पुराना सा?
खाकर लाख ठोकरें भी
दिल मेरा है अब भी सीधा सा.

परमीत सिंह धुरंधर
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गले -गुलिस्ता में


ये मिटटी मेरी है, ये अम्बर मेरा है
मगर मैं तनहा हूँ इस गले गुलिस्ता में.
ये दरिया मेरी है, ये सागर मेरा है
मगर मैं प्यासा हूँ इस गले -गुलिस्ता में.
जिसको भी चाहा, वो ही हमसे रूठा
किस – किस को मनाएं इस गले -गुलिस्ता में?
निगाहें है कातिल, अदायें हैं शातिर
कब तक बचाएं दामन इसे गले -गुलिस्ता में?

परमीत सिंह धुरंधर

हरियाणा – छपरा -मथुरा


क्या रखा है बेकार का डराने में?
कभी आ के देखो हरियाणा में.
यहाँ से अगर निकल गए
तो आँख गराना छपरा पे.

यहाँ की लाठी तोड़ दे
वहाँ की लाठी फाड़ दे
फिर भी अगर बच गए
तो मिठाई चढ़ाना मथुरा में.

परमीत सिंह धुरंधर

ई ह छपरा रानी


लूट जाइ जोबना, बिकाइ खटिया
ई ह छपरा रानी, मत मिलावअ नजरिया।
यहाँ खेल -खेल में मिलिहन धुरंधर
बात – बात में यहाँ निकले दुनालिया।
खुल जाइ चोली, हेराइ नथुनिया
ई ह छपरा रानी, मत लचकावा कमरिया।
रख ल मुख पे घूँघट आ पत्थर दिल पे
ई ह छपरा रानी, यहाँ हल्दी लागेला उड़ा के चिड़िया।

परमीत सिंह धुरंधर

मुजराईल अमवा के डाल


लचकावे लू कमरिया जैसे मुजराईल अमवा के डाल
रानी बहकावा तारु जियरा, दे के नैनन से प्रेम-पैगाम।

परमीत सिंह धुरंधर

समंदर


जब दिल टुटा
तो ए समंदर
मैं भी तुम्हारी तरह लहराया।

परमीत सिंह धुरंधर

उम्र का सिला देखिये


मेरी उम्र का सिला देखिये
बहकते कदम, झुकी नजर देखिये।

मेरी उम्र का सिला देखिये
कपकपाते अधर, बलखाती कमर देखिये.

हसरते जवान, बेचैन धड़कने-२
रातों का इनका कहर देखिये।
मेरी उम्र का सिला देखिये।।

ना नैनों में नींद, ना मीठा कोई स्वप्न
मचलते अरमानों के सेज की दाहक देखिये।
मेरी उम्र का सिला देखिये।।

मेरी उम्र का सिला देखिये
हसीं गालों पे जुल्फों का भंवर देखिये।
मेरी उम्र का सिला देखिये।।

टूटे तारे रात भर जिसकी मोहब्बत में
उसके हुस्ना का ये सहर देखिये।
मेरी उम्र का सिला देखिये।।

बरसते बादल, चमकती बिजली
अम्बर में ये जुगल देखिये।
मेरी उम्र का सिला देखिये।।

परमीत सिंह धुरंधर