पहाड़


ए पहाड़
तुझे कोई मिटाना चाहता है
की तू ब्रह्मिणवाद की पहचान है.
तुझे कोई अपना कहता है
तुझे बचाना चाहता है
की तू उनके अपने जंगल का है.
फिर कौन है तू?

वो बाते करते हैं तेरी
पर तेरे अस्तित्व की नहीं।
जो तुझे जंगल का कहते हैं
उन्हें ना जंगल की चिंता है, ना तेरी
उनको डर हैं अपने पहचान की
अपने पिछड़ जाने की इस दौड़ में।
जो तुझे ब्राह्मणों का कहते हैं
उन्हें तुझसे तो कोई भय नहीं
तू जड़ है, स्थिर है, मूक है, अहिंषक है
फिर ये तेरा ऐसा, भीषण विरोध कैसा?

परमीत सिंह धुरंधर 

कौन कहता है?


कौन कहता है की इश्क़ में मजा नहीं?
हँस रहा हूँ या रो रहा हूँ, खुद को ही पता नहीं।

कौन कहता है की हुस्न वफादार नहीं होता?
थोड़ा उछालो, खनकावो या बिछा दो,
सिक्के सोने के, चांदी के, फिर देखो
वैसी कोई रात कभी आती नहीं।

समंदर आज भी शिकारी है
ये तो लोग हैं जो किनारों पे घर बनाने लगे हैं.

परमीत सिंह धुरंधर 

धुप में


इन आँखों का असर देख साकी
पी मैं रहा हूँ, झूम तू रही है.

अंग ये पुष्प से, खिल उठे हैं धुप में
ऐसी क्या बात है गोरी, तू छुप रही है शर्म से.
तू कहे तो रंग दूँ, आज तुझे अपने रंग में
फिर नहीं आएगा ये मौसम किसी सर्द में.

विचारधारा अलग-अलग है
पर हम एक हैं, हिन्दोस्तान हमारा है.

परमीत सिंह धुरंधर 

जोगीरा सारा रारा, जोगीरा सारा रारा।


इ रहली छपरा के, उ रहली सिवान के
दुनो के रंगनी बीच महराजगंज – बाजार में.
जोगीरा सारा रारा, जोगीरा सारा रारा।

इ के बाप थानेदार, उ के बाबू जी तहसीलदार
दुनो के मिलल बा बकलोल भतार।
जोगीरा सारा रारा, जोगीरा सारा रारा।

इ मिले गाछी में, उ मिले बथानी
इ कहे हमके राजा, उ कहे स्वामी।
जोगीरा सारा रारा, जोगीरा सारा रारा।

इ कहस माई – माई, उ कहस ताई – ताई
जब डालनी रंग पकड़ के कलाई।
जोगीरा सारा रारा, जोगीरा सारा रारा।

इ कहस छोड़ दे, उ कहस अब रहे दे
हम कहनी तानी अउरी लहे दे.
जोगीरा सारा रारा, जोगीरा सारा रारा।

इ लगली गलियाये, उ लगली छटपटाये
जब चोली दुनो के लगनी भिंगाये।
जोगीरा सारा रारा, जोगीरा सारा रारा।

इ चाटे चटनी, उ चखे चोखा
देख के पाकल कटहल, खाये लागली कोवा।
जोगीरा सारा रारा, जोगीरा सारा रारा।

परमीत सिंह धुरंधर 

वीरांगना का सुहाग


चौहानों का इतिहास हम फिर से लिखेंगे
हम नहीं चुनेंगे उन्हें, वो हमें चुनेंगें।
पिता के सामने जो पति मान ले
उस वीरांगना का सुहाग बन हम चमकेंगे।

परमीत सिंह धुरंधर 

बिहार अपनी बूढी माई रे


हम ना हिन्दू, ना मुस्लिम
ना हम सिक्ख ना हम ईसाई रे.
हम हैं बिहारी रे बंधू
बिहार अपनी बूढी माई रे.
छपरा जिसका ह्रदय
जहाँ बहती है पुरवाई रे.
और गंगा जिस धरती पे
लेती है, बलखा – बलखा अंगराई रे.

हम जाए चाहे जहाँ
यादों में बस उसकी ही परछाई रे.
सारी दुनिया घूम ले हम चाहे
चाहे जितनी भी हो कमाई रे.
खाते हैं हम लिट्टी-चोखा
डाल के उसपे मलाई रे.
हम हैं बिहारी रे बंधू
बिहार अपनी बूढी माई रे.

परमीत सिंह धुरंधर 

जो तू जुल्फों में सुलाए रे


तेरे दो नैना गोरी, चाँद को ललचाये रे
कैसे थामें दिल धुरंधर, जब कमर तेरी बलखाये रे?
छोड़ दूँ छपरा, छोड़ दू कचहरी
डाल दूँ खटिया आँगन में
जो तू जुल्फों में सुलाए रे.

डाल के कजरा, छनका के पायल
जवानी के आग में, तू छपरा को झुलसाए रे.
लहरा – लहरा के तेरा आँचल, बादल को पागल बनाये रे.
छोड़ दूँ छपरा, छोड़ दू कचहरी
डाल दूँ खटिया आँगन में
जो तू जुल्फों में सुलाए रे.

परमीत सिंह धुरंधर 

सीधा सा


रात का नशा है तनहा – तनहा
किसे पुकारें, दर्द है ये पुराना सा?
खाकर लाख ठोकरें भी
दिल मेरा है अब भी सीधा सा.

परमीत सिंह धुरंधर
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गले -गुलिस्ता में


ये मिटटी मेरी है, ये अम्बर मेरा है
मगर मैं तनहा हूँ इस गले गुलिस्ता में.
ये दरिया मेरी है, ये सागर मेरा है
मगर मैं प्यासा हूँ इस गले -गुलिस्ता में.
जिसको भी चाहा, वो ही हमसे रूठा
किस – किस को मनाएं इस गले -गुलिस्ता में?
निगाहें है कातिल, अदायें हैं शातिर
कब तक बचाएं दामन इसे गले -गुलिस्ता में?

परमीत सिंह धुरंधर

हरियाणा – छपरा -मथुरा


क्या रखा है बेकार का डराने में?
कभी आ के देखो हरियाणा में.
यहाँ से अगर निकल गए
तो आँख गराना छपरा पे.

यहाँ की लाठी तोड़ दे
वहाँ की लाठी फाड़ दे
फिर भी अगर बच गए
तो मिठाई चढ़ाना मथुरा में.

परमीत सिंह धुरंधर