ना नजर से नजर को मिलाया करो
उम्र ही है ऐसी अभी, दुरी रखा करो।
चाहत है तुमको मेरे इन लबों की
तो जमाने भर में ना गाया करो.
परमीत सिंह धुरंधर
ना नजर से नजर को मिलाया करो
उम्र ही है ऐसी अभी, दुरी रखा करो।
चाहत है तुमको मेरे इन लबों की
तो जमाने भर में ना गाया करो.
परमीत सिंह धुरंधर
मत पूछो शहर में मयखाना किधर है?
हर एक गली में है यादें उनकी।
जिधर चाहो, उधर बैठ जाओ
भला कब मिटी है प्यास उनकी।
छोड़ दिया हैं मैंने अब तो भटकना
मिला ना दुबारा फिर वो साकी।
पागल कहता है जमाना मुझे
ख्वाब अब भी उन्ही के लबों की.
परमीत सिंह धुरंधर
दर्द उनका अधूरा सा है
जिंदगी में हम जो मुस्कराने लगे.
मेरी खामोशी को कमजोरी समझकर
वो महफ़िल थे अपनी सजाने लगे.
उस चाँद पे है मायूसी के बादल
जब फकीरी में भी हम गुनगुनाने लगे.
सवरना उनका अधूरा सा है
गजरा फिर जुल्फों में हम लगाने लगे.
परमीत सिंह धुरंधर
तू नजर तो रख मेरे जिस्म पे
दिलों में अहसास खुद-ब-खुद आ जायेगी।
तू चाहत क्यों रखता है मेरी अपने सेज पे?
ख़्वाबों में बिन बुलाये ही आ जाउंगी।
कुछ फासले बन ही जानते हैं राहों में
मंजिलों पे समेट लेने को उन्हें.
तू क्यों थामना चाहता हैं इन राहों में?
मैं ऐसे तो शर्म उतार ना पाउंगीं।
परमीत सिंह धुरंधर
हसरते उन्ही की दिलों में रखिये
जिनकी यादों में हैं पीने लगे.
कब तक संभालोगे जाम हाथों से
आँखों से दर्द जब हैं छलकाने लगे.
अधूरा है जीवन सब का यहाँ
चाहे राम हो या गुरु गोबिंद सिंह जी.
राजपूत वो ही है सच्चा
जो रणभूमि में अपनों पे गांडीव उठाने लगे.
परमीत सिंह धुरंधर
उनके जिस्म पे जो
ये गहने हैं
पैसों से तो सस्ते
पर पसीने से बड़े महंगे हैं.
कैसे उतार के रख दे?
वो ये गहने अपने जिस्म से
चमक में थोड़ी फीकी ही सही
मगर इसी चमक के लिए
मेरे बैल दिन – रात बहते हैं.
मेरे बैलों को कोई पशु ना कहे
हैं की उन्ही के बल पे
मेरे घर के चूल्हे जलते हैं
और उनके कर पे वस्त्र
और गहने चमकते हैं.
परमीत सिंह धुरंधर
उनके जिस्म पे जो
ये गहने हैं
पैसों से तो सस्ते
पर पसीने से बड़े महंगे हैं.
यूँ ही नहीं
इठलाती हैं, बलखाती हैं
सखियों के बीच वो
और फिर लौटते ही
मेरे जिस्म पे झूल जाती हैं.
उनकी ये अदा दौलत के आगे
तो बहुत फीकी है
पर शोहरत में बहुत चमकीली है.
परमीत सिंह धुरंधर
वो College Of Agriculture
तुझे मेरा शत – शत बार नमन.
तेरे पावन आँगन में आकर
मैंने पाए खुशियाँ अनगिनत।
घोंसलों से निकला ही था मैं,
तूने मेरे पंखों को
अनंत आसमान दे दिया।
और मैं भी उड़ता रहा – उड़ता रहा,
बिना सोचे, समझे, बिना किसी लक्ष्या के
तूने मेरे नस – नस में ऐसा उत्साह भर दिया।
वो College Of Agriculture
तुझे मेरा शत – शत बार नमन.
तेरे पावन आँगन में आकर
मैंने पाए खुशियाँ अनगिनत।
ना डर, ना भय, ना क्रोध
बस मैं और तेरा आँचल।
किताबों का शौक
दोस्तों का चस्का
ऐसा जगाया तूने
की मेरे पथ को कभी अँधेरा ढक नहीं पाया।
पथ भले कंटीला मिला मुझे
पर हौंसला आज तक टूट नहीं पाया।
वो College Of Agriculture
तुझे मेरा शत – शत बार नमन.
तेरे पावन आँगन में आकर
मैंने पाए खुशियाँ अनगिनत।
परमीत सिंह धुरंधर
माता का नाम सुशीला,
और पिता का नाम हो धुरंधर,
तो फिर पुत्र अद्भुत होगा ना.
उसपर माटी हो छपरा की,
तो फिर वो Crassa होगा ना.
पढ़ने में चतुर, लिखने को आतुर,
प्रेम में व्याकुल हर क्षण
वो निरंतर होगा ना.
शिव जी का उपासक,
गणेश जी का भक्त,
माँ सरस्वती के चरणों में रोज
माथा नवाता होगा ना.
हारवर्ड के पछुआ में
पुरबा गाता होगा ना.
परमीत सिंह धुरंधर
सुशीला के इह बेटा
ह बड़का बिगड़ैल।
फांसले बानी
छपरा के इ धुरंधर के
अपना नथुनी पे.
आवतारन प्यासल – भूखाइल सैयां
सखी आज टेम्पू से.
परमीत सिंह धुरंधर