तेरे अंग – अंग से लग के,
मैं हो गयी विशाल।
थोड़ा काटों धीरे – धीरे राजा,
अभी हूँ मैं नै एक कचनार।
परमीत सिंह धुरंधर
तेरे अंग – अंग से लग के,
मैं हो गयी विशाल।
थोड़ा काटों धीरे – धीरे राजा,
अभी हूँ मैं नै एक कचनार।
परमीत सिंह धुरंधर
तेरी – मेरी चाहत जरुरी है,
कुछ साँसों की गर्मी है,
और कुछ मज़बूरी है.
जब भी मिलती है तू,
सरक जाता है तेरा आँचल।
कुछ हवाओं का जोर है,
और कुछ तेरी जवानी है.
तेरी हर निगाह, एक क़यामत है,
कोई माने या ना माने, मैं मानता हूँ.
पर तू बनेगी किसी और की ही,
कुछ हुस्न की नियत,
और कुछ मेरी बेबसी है.
परमीत सिंह धुरंधर
मेरे दिल की दुनिया में एक सूना सा आँगन है,
जिसकी दीवारों पे कुछ भी नहीं है अपना।
ख़्वाबों को क्या देखें? जिसे दोस्त समझा,
वो ही उम्र भर का है दुश्मन अपना।
उमरते हैं बादल, घने – काले बरसने को,
पर उसके छत्ते पे आके रंग बदल लेते हैं अपना।
परमीत सिंह धुरंधर
I love curvature
With the shape of eight
And if you think you have
You can have my pocket and wallet.
I love big curvature
With the shape of eight
Oh baby
Do and do more
Pushup and squat
If you want to have
My pocket and wallet.
Parmit Singh Dhurandhar
I want you in my arms
Even it is for a night
Even if it is just a crime
Even if my dad slaps me hard
I want you in my arms.
Parmit Kumar Singh
मेरी किस्मत में तेरी चाहत ही नहीं,
मैं हूँ एक आवारा बादल,
मुझे कोई तुझसे शिकायत भी नहीं।
तू एक रात जो मेरे पास ठहर जाए,
मैंने अपनी दुआ में,
अगली कोई सुबह मांगी भी नहीं।
तेरी चोली के बटन पे माना है Khattri का साया,
पर तेरी चोली के बटन,
कोई Crassa सा तोड़ता भी तो नहीं।
परमीत सिंह धुरंधर
यूँ ही नहीं तेरे लिए अपना खून बहाऊंगा,
तू कभी मिल तो सही तुझे अपना लहू पिलाऊंगा।
तेरी मंशा अगर मुझे मिटाने की ही है साकी,
तो अपने अधरों पे रख के दे, विष भी पि लूंगा।
शिव का भक्त हूँ,
मेरा प्रेम कोई चंचल नहीं है.
तुझे अगर चाहत है आभूषणों और दौलत की,
तो मैं वो गृहस्थ नहीं बन पाउँगा।
मेरी आदत है अकेला ही चलने की,
भीड़ को मैं अपने साथ नहीं रखता।
तुम्हे अगर चाहत है सत्ता की,
तो मेरा साथ छोड़ दो,
मैं अपने बगावत के रंग नहीं बदल पाउँगा।
Dedicated to Baba Nagarjuna
परमीत सिंह धुरंधर
बहुत उदास हूँ समंदर तेरी चाहत में,
मैं प्यासा तो रह सकता हूँ तेरी इंतजार में,
मगर बर्दास्त नहीं की तेरी लहरें लौट जाए,
बिना आये मेरे आगोस में.
कब कहा की घूँघट उठा कर दीदार दे अपने हुस्न का?
कब माँगा की जिस्म को छूकर अहसास दे अपनी वफ़ा का?
मगर बरदास नहीं की तू ज्वार-भाटा बन जाए,
एक आसमा के चाँद के ख्वाब में.
परमीत सिंह धुरंधर
जब से जवनिया के चोलिया में बंध नी,
नगरिया के सब कोई पूछे ला उमरिया,
कैसे कहीं ए सखी, शर्म के छोड़ के?
सौतन भइल बिया जाड़ा में खटिया।
परमीत सिंह धुरंधर
अइसन बाटे बिहारी बलमुआ
दाँते से रोज काटे बलमुआ।
कैसे कहीं ये हो सखी?
चोली के हमर सारा बटन,
दिन भर टाँके ला हमर बलमुआ।