विशाल वक्षो पे प्रहार करो, वत्स


विशाल वक्षो पे
प्रहार करो, वत्स।

नयनों को लड़ाते
अधरों को चूमते
ग्रीवा से होकर
अपने गर्व का
वक्षों पे हुँकार भरो, वत्स।
विशाल वक्षो पे
प्रहार करो, वत्स।

ये चाँद भी तुम्हारा
ये निशा भी तुम्हारी।
उषा के आगमन तक
तनिक भी न
विश्राम करो, वत्स।
विशाल वक्षो पे
प्रहार करो, वत्स।

ये वक्त भी तुम्हारा,
ये पथ भी तुम्हारा।
उनके शर्म को
उन्ही की वेणी से बांधकर
उन्ही के वक्षों पे
संहार करो, वत्स।
विशाल वक्षो पे
प्रहार करो, वत्स।

ना भय में बंधो
ना भविष्य की सोचो
की वो वफ़ा करेगी
या बेवफा निकलेगी।
बस अपने कर्म पथ पर
अडिग हो कर
उनके नस – नस में उन्माद भरो, वत्स।
विशाल वक्षों पे
प्रहार करो, वत्स।

उनके उमरते-मचलते
विलखते-पिघलते
कसमसाते विशाल देह को
अपने प्रचंड, बलिष्ठ
भुजाओं में दबोच कर
अनंत समय तक
प्यार करो, वत्स।
विशाल वक्षो पे
प्रहार करो, वत्स।

 

परमीत सिंह धुरंधर

वो शिव है


अनंत है जो
वो शिव है.
विराज है कैलाश पे
पर समस्त ब्रह्माण्ड
अधीन है.
सर्वस्व का त्याग कर
सर्वस्व का स्वामी है.

योगी है, वैरागी है
भूत-भभूत, भुजंगधारी है.
गरल को तरल कर दे
सरल-ह्रदय, प्रचंडकारी है.
सर्वस्व का त्याग कर
सर्वस्व का स्वामी है.

काल को स्थिर करे
प्रचंड को सूक्ष्म करे.
नग्न-धरंग, अवघड़-अलमस्त
जटाधारी है.
सर्वस्व का त्याग कर
सर्वस्व का स्वामी है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

क, ब, स, ख, ह, प, और र


क से कबिता लिखता हूँ
ब से बबिता के प्रेम में.
स से सबिता भी मांगती है
ख से खटिया पे मेरे कुछ रातें।

ह से हरिता बेचैन है
प से प्रियंका की सुन बातें।
र से राधिका ने कैसे – कैसे
ब से वाटिका में मेरे बिताईं हैं रातें।

 

परमीत सिंह धुरंधर

My girl wants a nickname


My girl wants a nickname
As she hides her face
Whenever we are together
And of course, on the bed.

My girl wants a dark room
As she loves doing new things
But does not like to reveal
The secret of her fire
Whenever we are together
And of course, on the bed.

 

Parmit Singh Dhurandhar

साली – छाली


वरसों से जमाई थी हमने दही पे छाली,
काट गयी वो सजाव सिकहर पर चढ़कर साली।

 

परमीत सिंह धुरंधर

सेज पे हमारे भी कोई संगनी होती


अगर आप होते पापा,
तो अपनी भी शादी होती।
जिंदगी के ग़मों को समझने वाली,
कोई तो एक घरवाली होती।

अपने नयनों से जो मन को,
बाँध लेती।
और आपके दिल की भी,
शहजादी होती।

रातों में चाँद शिकायतें,
जो करती।
मगर दिन में फिर से,
हिरन सी कुलांचें भी भरती।

अगर आप होते पापा,
तो अपनी भी शादी होती।
सेज पे हमारे भी कोई संगनी होती।

 

परमीत सिंह धुरंधर

शौक


मौका ही नहीं मिला समुन्दर से खेलने का,
सितारों ने ही ऐसे उलझा के रख दिया।
शौक भी होता है किसी -किसी को जवानी में बिखरने का,
यूँ ही आशिकों ने इश्क़ में खुद को नहीं मिटा दिया।

 

परमीत सिंह धुरंधर

अपनी चारपाई पे भी एक लुगाई होती


अगर आप होते पापा,
तो अपनी भी शादी होती।
यूँ जिंदगी भर की,
अय्यासी ना होती।

आप दिखला देते अब भी राह,
ऊँगली पकड़ कर.
यूँ भटकती जिंदगी ना होती।

झोपडी में ही सही,
अपनी चारपाई पे भी एक लुगाई होती।
यूँ विशाल महलों में,
तन्हाई ना होती।

चूल्हे पे सेंकी रोटी होती,
और उसपे किसी के मायके की घी भी लगती।
यूँ ही विरयानी और पिज़्ज़ा से,
पेट की भूख न मिटती।

रात के समन्दर में,
यूँ साथी न मिलता हर बार.
घर के चार दीवारों में भी,
एक कहानी होती।

वशिष्ठा सी जमी होती,
गृहस्ती।
इंद्रा सी व्याकुल और
अधीर साँसें ना होती।

 

परमीत सिंह धुरंधर


कबी अपन नाटन का भी जिकार कर डिजिये। जिंदगी का कुच यस भी लूफ़्ट लिजिये। कब तक गुजरोग जिंदगी भटकक कर। कबी मात्र कामरे को हाय अपना घर मान लिजिये.माणा की पारिओन सी नाही हुन हसीन। 

गुजरी हुई राटो का साहर नही कर्ना। बकरर राहती हुन मुख्य मुजे बदनाम नही कर्ना.लग जाति हू सेने से बीना कुच सोच संजे, एंज एंग तुम्हेसएम्प के .जाणे खान खान जी रहे मात्र विशाल, खंडन का व्यापर नाहिबर्णा में