आस्फाक – आफताब


जात – धर्म – मजहब में बंधकर,
कब किसने दोस्त बनाया है?
विस्मिल को आस्फाक मिलें,
तो मैंने भी आफताब को पाया है.

अपनों ने ही लुटा है,
खंजर पीठ में गड़ा के.
सिरोजदुल्ला को मीरजाफर मिलें,
तो पृथ्वीराज को जयचंद ने हराया है.

कब नारी ने सम्मान के बदले,
सम्म्मान लौटाया है.
जिसने उसे भेजा गैरों के बाहों में,
मेनका ने उसकी के लिए मातृत्व को ठुकराया है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

कोई तो फूल खिला दो


सीना – सीने से लगाकर,
वो बोली धीरे से कानों में,
कोई तो एक फूल खिला दो,
अब इस आँगन में.

मन ऊब गया है इस खेल से,
जो खेलते हैं बस बंद कमरे में.
कोई तो एक खिलौना दे दो,
की मैं भी खेलूँ खुले आँगन में.

 

परमीत सिंह धुरंधर

प्रसव-पीड़ा


काँटों ने कब रोका है तुम्हे?
गुलाब को चूमने से.
मगर चुभ जाए तुम्हे तो समझो,
की तुम बहुत असावधान हो राहों में.

बाधाएँ तो निरंतर हैं,
पल – पल में जीवन के.
प्रसव-पीड़ा से नारी को,
कब रोका है मौत के भय ने?

उसी माँ के दूध से तुम हो,
फिर भय कैसा इन प्राणों का?
और कैसे छोड़ दूँ माँ को अपने,
रूप – रस में फंसकर,
बेवफा मेनकाओं के.

 

परमीत सिंह धुरंधर

कैसे पुरुषार्थ करे मानव?


मेरे कदम चलना नहीं चाहते,
और पेट भोजन का मोह त्यागना नहीं चाहता।
नयन चाहते हैं उसके यौवन पे ही,
सदा – सर्वदा टीके रहें।

कैसे पुरुषार्थ करे मानव?
जब जिस्म उसके आगोस की,
गुलामी, आँखों की मक्कारी,
को तोड़ना नहीं चाहता।

 

परमीत सिंह धुरंधर

मैंने सींचा है


ए समुन्दर,
तुझे क्या अहसास है मेरे ओठों का?
तूने पीया है,
मैंने सींचा है.

तुमने बाँधा है,
मैंने खिलाया है, उड़ाया है.
तुम्हारे गर्भ में अन्धकार है,
मैंने हर आँगन में दीप जलाया है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

स्त्री का शोषण


गुनाहों का भी चरित्र होता है,
तभी तो,
स्त्री का शोषण करने वाले,
ही उसके दिल के करीब हैं.

कब समझा है मेनका ने?
प्रेम, मातृत्वा, और वातशल्या को,
तभी तो चाँदी और सोने के बदले,
उसके अंग – अंग पे भोगी – विलासी,
का अधिकार है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

मैंने तो बस माँ को नमन किया है


गहन अध्धयन कर के,
मैंने सर झुका दिया है.
और गलत समझ रहे हैं आप लोग,
मैंने तो बस माँ को नमन किया है.

यौवन जिसका खो गया,
चूल्हों से दिन – रात जूझते।
सौंदर्या जिसका कुम्हला गया,
पकवानों से मेरे जढराग्नि को तृप्त करते।

उस दुर्लभ प्रेम को मैंने,
मैंने दुर्जन में समझ लिया है.
सुशीला देवी का सुपुत्र हूँ,
नस – नस ने मेरे इस ज्ञान पे,
अभिमान का आभास किया है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

वक्षों की गोलाईयाँ


कहाँ – कहाँ से लाती हो?
अंगों पे अपने बिजलियाँ।
चंचल – चपल नयन तुम्हारे,
उसमे मयखाने की मस्तियाँ।

सुराही सी पतली कमर पे,
यौवन की अटखेलियाँ।
सुन्दर – सुसज्जित-सुगन्धित उपवन की,
फीकी पद गयीं हैं सारी कलियाँ।

कोमल – कोमल अधरों का,
पल – पल में कम्पित होना।
जैसे उषा के आँगन में,
पुष्पित होती पंखुड़ियाँ।

सागर – अम्बर सब तड़प उठते हैं,
तेरे मुखड़े पे जब घुघंट आ जाए.
लहरें भी विचलित हो उठीं हैं,
देख के तेरे वक्षों की गोलाईयाँ।

कौन हरेगा, कौन बेधेगा?
तेरे रूप – यौवन के इस तिलिश्म को.
जो भी हो, अभी से ही,
टूटने लगी हैं आँगन – आँगन में चारपाइयाँ।

 

परमीत सिंह धुरंधर

फिर बिहार देखिये


शहर देखिये, सुलतान देखिये,
अगर इतिहास देखना है तो,
फिर बिहार देखिये।

शर्म देखिये, सौंदर्य देखिये,
अगर यौवन देखना है तो,
फिर बिहार देखिये।

बलवान देखिये, पहलवान देखिये,
अगर पौरष देखना है तो,
फिर बिहार देखिये।

कलियाँ देखिये, कांटे देखिये,
अगर फूल देखना है तो,
फिर बिहार देखिये।

मुंबई देखिये, दिल्ली देखिये,
अगर किसान देखना है तो,
फिर बिहार देखिये।

काश्मीर देखिये, कन्याकुमारी देखिये,
अगर भारत देखना है तो,
फिर बिहार देखिये।

गीता पढ़िए, कुरान पढ़िए,
अगर इंसानियत पढ़नी है तो,
फिर बिहार देखिये।

नेहरू पढ़िए, गांधी पढ़िए,
देश को जानना है तो,
फिर राजेंद्र बाबू पढ़िए।

 

परमीत सिंह धुरंधर

वो ही कृष्णा है


जो मधु से मधुकर,
जो सूक्ष्म से सूक्ष्मतर,
जो भय से भी भयंकर,
वो ही कृष्णा है.

जो प्रबल में प्रबलतम,
जो न्यून में न्यूनतम,
जो श्रेष्ठ में श्रेष्ठतम,
वो ही कृष्णा है.

जो सागर में समुन्दर,
जो चिर में निरंतर,
जो अमृत के सामानांतर,
वो ही कृष्णा है.

जो कण – कण में सम्माहित,
काल में प्रवाहित,
काम-तप-रज में संचालित,
वो ही कृष्णा है.

जो भूखंड के खंड में,
पुष्प के मकरंद में,
जो आनंद – विरह के क्षण में,
वो ही कृष्णा है.

जो नारी के सौंदर्य में,
शिशु के बालपन में,
और प्रेयसी के आलिंगन में,
वो ही कृष्णा है.

जो रण में,
शयन में,
मन के हर चुभन में,
वो ही कृष्णा है.

जो शिव के तांडव में,
इंद्रा के विलास में,
सरस्वती के ज्ञान में,
वो ही कृष्णा है.

 

परमीत सिंह धुरंधर